सीरिया शरणार्थी शिविर: कहीं कल का दर्द है तो कहीं बेहतर कल की उम्मीद

जातअरी (जॉर्डन): जॉर्डन में जातअरी शरणार्थी शिविर का इलाका जहां खिली हुई धूप में खेल रहे कुछ बच्चे कारों के काफिले को देखकर दौड़ते हैं, मानो वो कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन सिर्फ हंसकर रह जाते हैं. उनकी आंखों में बेहतर कल की उम्मीद नजर आती है और साथ ही अतीत का वो दर्द भी जिसे झेलते हुए वे अपना वतन छोड़ आये हैं. ये बच्चे अपना वतन छोड़ने और कई अपनों को खोने का दर्द शायद ही बयां कर पाएं, लेकिन जातअरी का पूरा इलाका इनके दर्द और इस दर्द पर लगाये जा रहे मरहम की कहानी बखूबी कह रहा है.

80 हजार लोगों को पनाह दिए हुए है शिविर
सीरिया की सीमा के नजदीक और जॉर्डन की राजधानी अम्मान से करीब 80 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बनाया गया यह जातअरी शरणार्थी शिविर करीब 80 हजार लोगों को पनाह दिए हुए है. 5.3 किलोमीटर के दायरे में बसाए गए इस शिविर में रहने वाले वो लोग हैं जो सीरिया में मार्च, 2011 में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद दरबदर हुए और किसी तरह जान महफूज रही तो सीमा लांघकर जॉर्डन की सरजमीं पर पहुंचे. दुनिया का सबसे बड़ा शरणार्थी शिविर कहे जाने वाले जातअरी शिविर में हर किसी की अपनी कहानी है, लेकिन हर कहानी की जड़ में एक जैसी ही वजहें हैं. ये वजहें अशांति, अराजकता और अत्याचार की हैं.

बच्चों के अच्छे भविष्य की चिंता
शिविर की एक संकरी गली में कुछ महीने के बच्चे को लिए खड़ी आसिया महमूद (30) करीब पांच साल पहले की दर्दभरी यादों को लेकर भावुक हो जाती हैं और अपने तीनों बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए दुआ करती हैं. सीरिया में गृहयुद्ध शुरू होने के बाद वह अपने पति और एक बच्चे के साथ अस सुवेदा इलाके से भागकर जॉर्डन पहुंची. उन्होंने इसी शिविर में दूसरे बच्चे और कुछ महीने पहले ही तीसरे बच्चे को जन्म दिया. उन्होंने एक दुभाषिए की मदद से बताया, ‘हमारा सब कुछ खत्म हो गया. मैं उस मंजर को याद नहीं करना चाहती. बस अल्लाह से यही दुआ है कि मेरे बच्चों का भविष्य अच्छा हो.’

बदल गई जौदत मोहम्मद की जिंदगी
यहां के फुटबॉल ट्रेंनिग अकादमी में प्रबंधक की भूमिका निभा रहे 26 वर्षीय जौदत मोहम्मद अल-मल्हम को 21 फरवरी, 2013 को अपने पूरे परिवार के साथ सीरिया के दारा से भागकर जॉर्डन में शरण लेनी पड़ी और उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गयी. जौदत ने अपने पुरानी दुखद यादों को बयां करते हुए कहा, ‘पांच साल पहले और मेरी आज की जिंदगी में बहुत फर्क है. मैं मेधावी छात्र था, लेकिन बदकिस्मती यह कि मुझे स्नातक के पहले साल में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी और तबसे इस शिविर में जिंदगी कट रही है. अब फुटबॉल अकादमी में काम कर रहा हूँ.’ तमाम दिक्कतों के बीच जौदत की कुछ सुखद यादें भी इस शरणार्थी शिविर से जुड़ गई हैं. उन्हें शिविर में ही एक लड़की से प्रेम हुआ और एक अप्रैल, 2016 को उनकी शादी हुई. वह एक बच्ची के पिता भी बन चुके हैं.

इमाद अहमद अल-शिबली (42) भी करीब चार साल पहले दारा से भागकर जॉर्डन पहुंचे थे. आज वह अपनी पत्नी और चार बच्चों (2 बेटा और दो बेटी) के साथ भविष्य को बेहतर बनाने की कोशिश में जुटे हैं. इमाद कहते हैं, ‘हम जॉर्डन की सरकार के शुक्रगुजार हैं कि उसने हमें रहने की जगह दी. हम जॉर्डन के शाह अब्दुल्ला और महारानी रानिया के हमेशा कर्जदार रहेंगे. अब बस मैं अपने बच्चों की आगे की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए मेहनत कर रहा हूं. यहां रहने वाले शरणार्थी भी मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहायता एजेंसियों, गैर सरकारी संगठनों और विभिन्न सरकारों की मदद से इनकी जिंदगी में बेहतरी आई है.

कैलाश सत्यार्थी भी मिले बच्चों से
नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी भी रविवार (25 मार्च) को जातअरी शिविर में रहने वालों बच्चों का दर्द बांटने और वहां के मौजूदा हालात जानने के लिए पहुंचे. उन्होंने यहां बच्चों से बात की और उनके साथ फुटबॉल भी खेला. वह कई बच्चों के अभिभावकों से भी मिले. बच्चों से मिलने के बाद सत्यार्थी ने कहा, ‘मैं यहां बच्चों की मासूमियत और पवित्रता से अभिभूत हो गया. सभी लोगों को मिलकर इनके भविष्य को संवारने की कोशिश करनी होगी.’ वर्ष 2012 में जॉर्डन की सरकार और संयुक्त राष्ट्र ने इस शिविर का निर्माण कराया था.

शिविर में 20 स्कूल और 10 स्वास्थ्य केंद्र
कभी कुछ दिनों के लिए पनाह लेने और फिर अपने वतन लौटने की सोचकर पहुंचे बहुत सारे लोग अब यहीं जिंदगी को आगे बढ़ने की आदत डाल चुके हैं. बहुत सारे लोगों ने दुकानें खोल ली हैं या कुछ दूसरे काम शुरू कर दिए हैं ताकि वे अपने और बच्चों के भविष्य को बेहतर बना सकें. इस शिविर के लोगों के लिए फिलहाल करीब 10 छोटे-बड़े स्वास्थ्य केंद्र हैं. करीब 20 स्कूल भी चलाये जा रहे हैं. शिविर में कई बुनियादी सुविधाओं और खाद्य पदार्थो की पर्याप्त आपूर्ति की कमी की बात कई लोग करते नजर आए.

गृह युद्ध में मारे जा चुके हैं पांच लाख लोग
कई मीडिया रिपोर्ट की माने तो इस शिविर में देह व्यापार और यौन दासता (सेक्स सेलेवरी) जैसे अपराध भी हो रहे हैं. हालांकि यहां रहने वाले लोग तमाम दिक्कतों के बावजूद इस बात से सन्तुष्ट नजर आते हैं कि उनकी और उनके बच्चों की जान महफूज है. सीरिया में मार्च, 2011 में गृहयुद्ध की शुरुआत के बाद से करीब पांच लाख लोग मारे जा चुके हैं. यूएनएचसीआर के मुताबिक 56 लाख से अधिक लोग सीरिया से शरणार्थी के तौर पर जा चुके हैं.

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