नीरव मोदी, मेहुल चोकसी के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी

मुंबई: सीबीआई की एक विशेष अदालत ने रविवार को हीरा कारोबारी नीरव मोदी और उसके मामा मेहुल चोकसी के खिलाफ 13,500 करोड़ रुपये के पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले में गैरजमानती वारंट जारी किया. अदालत ने यह वारंट सीबीआई के अनुरोध पर जारी किया. इसके पहले दोनों ने घोटाले से संबंधित जांच में शामिल होने से इंकार कर दिया था. इस बीच, सीबीआई उन भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं के अधिकारियों से पूछताछ जारी रखे हुए है, जिन्होंने पीएनबी द्वारा जारी लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के आधार पर मोदी और चोकसी की कंपनियों को कथित ऋण दिए थे.

सीबीआई ने कहा कि इलाहाबाद बैंक की हांगकांग शाखा में विदेशी मुद्रा के लेनदेन को देखने वाले अधिकारी को हांगकांग से तलब किया गया था और उससे पूछताछ जारी है. अदालत से गैरजमानती वारंट जारी होने से दोनों आरोपियों के खिलाफ इंटरपोल से रेड कार्नर नोटिस जारी कराने का रास्ता भी खुल गया है.

इसके पहले मोदी और चोकसी के खिलाफ सीबीआई ने एक लुकआउट नोटिस जारी किया था. हालांकि मोदी अपने परिवार के साथ नोटिस जारी होने से पहले ही भारत छोड़ चुका था. मोदी और उसका भाई निशल पहली जनवरी को भारत छोड़ चुके थे, और चोकसी छह जनवरी को भारत से चला गया था. जबकि सीबीआई को पीएनबी घोटाले की शिकायत 29 जनवरी को मिली थी.

पीएनबी धोखाधड़ी: केन्द्र ने SC को बताया, अदालतों द्वारा कोई समानांतर जांच नहीं हो सकती
इससे पहले बीते 16 मार्च को केन्द्र सरकार ने 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक के पंजाब नेशनल बैंक धोखाधड़ी मामले में उच्चतम न्यायालय को बताया कि जांच में अदालत द्वारा कोई‘‘ समानांतर जांच’’ और‘‘ समानांतर निगरानी’’ नहीं हो सकती है. केंद्र ने शीर्ष अदालत के सीबीआई को दिये उस सुझाव का भी विरोध किया जिसमें इस मामले की जांच की स्थिति रिपोर्ट मोहरबंद लिफाफे में दाखिल करने की बात कहीं गई थी. न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक पीठ को अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने बताया कि जांच एजेंसियों के मामले की जांच शुरू करने से पहले लोग जनहित याचिकाओं के साथ अदालतों में आ जाते है.

पीठ में न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति डी वाई चन्द्रचूड़ भी शामिल थे. वेणुगोपाल ने पीठ को बताया,‘‘ क्या किसी को पीआईएल दाखिल करके इस अदालत में आने का कोई औचित्य है और कहते है कि अदालत को जांच की स्थिति के बारे में सूचित किया जाना चाहिए. अदालतों द्वारा समानांतर जांच और समानांतर निगरानी नहीं की जा सकती हैं.’’

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