आरक्षण का आधार जाति हो या गरीबी: इतिहास से बवाल तक की पूरी जानकारी, यहां पढ़ें

संविधान में सीधे सीधे आरक्षण का तो जिक्र नहीं है, लेकिन संविधान की मूल भावना के हिसाब से ही आरक्षण की व्यवस्था है.

नई दिल्ली: आज आरक्षण के खिलाफ सवर्णों का भारत बंद है. भारत बंद के दौरान आज सबसे ज्यादा हंगामा बिहार में हुआ है. बंद समर्थकों की मांग है कि या तो आरक्षण पूरी तरह खत्म कर दिया जाए या फिर आरक्षण जाति के आधार पर नहीं आर्थिक आधार पर दिया जाए. मतलब सवर्ण समाज में भी जो गरीब हैं उन्हें आरक्षण का लाभ मिले.

बिहार के आरा, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, गया, छपरा, पटना और इसी तरह बिहार के करीब एक दर्जन जिलों में दिनभर प्रदर्शनकारियों का उत्पात होता रहा. कहीं आगजनी, कहीं पथराव, कहीं रेल रोको तो कहीं सड़क जाम. इससे पहले पिछले हफ्ते दलित एक्ट में बदलाव के विरोध में दलित संगठनों ने भारत बंद बुलाया था. उस दौरान करीब दस लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे.

आरक्षण को लेकर क्या कहता है संविधान?

विवाद के केंद्र में आरक्षण का मुद्दा है. संविधान में सीधे सीधे आरक्षण का तो जिक्र नहीं है, लेकिन संविधान की मूल भावना के हिसाब से ही आरक्षण की व्यवस्था है. आपको बताते हैं कि इस मुद्दे पर संविधान क्या कहता है.

संविधान के अनुच्छेद 46 के मुताबिक, समाज में शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के हित का विशेष ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है. खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अन्याय और शोषण से बचाया जाए.

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संविधान किसी भी आधार पर भेदभाव की इजाजत नहीं देता है. संविधान के अनुच्छेद 17 में खास तौर से छूआछूत को खत्म किया गया है. साल 1989 में अनुसूचित जाति और जनजाति कानून भी बनाया गया ताकि जो भेदभाव कर रहे हैं, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सके. साल 2016 में कानून में संशोधन भी किया गया ताकि दलितों के खिलाफ अपराध को लेकर तेजी से कार्रवाई हो.

क्या है आरक्षण का इतिहास?

देश में अंग्रेजों के राज से ही आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत हुई थी. साल 1950 में एससी के लिए 15%, एसटी के लिए 7.5% आरक्षण की व्यवस्था की गई थी. पहले केंद्र सरकार ने शिक्षा, नौकरी में आरक्षण लागू किया था. केंद्र के बाद राज्यों में भी आरक्षण लागू कर दिया.

राज्यों में जनसंख्या के हिसाब से एससी, एसटी को आरक्षण का लाभ है. आरक्षण लागू करते वक्त 10 साल में समीक्षा की बात कही गई थी. साल 1979 में मंडल आयोग का गठन किया गया. ये आयोग सामाजिक, शैक्षणिक रुप से पिछड़ों की पहचान के लिए बना था. साल 1980 में मंडल आयोग ने पिछड़ों को 27% आरक्षण की सिफारिश की. इसके बाद साल 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर दी.

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ओबीसी को कितना आऱक्षण मिलता है?

साल 1990 से ओबीसी को 27% आरक्षण मिलने लगा. हालांकि साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओबीसी को आरक्षण मिलता तो सही है लेकिन क्रीमी लेयर के साथ मिलना चाहिए. मतलब जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनको आरक्षण न मिले.

साल 1993 में एक लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले क्रीमी लेयर में माने गए. अभी आठ लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले ओबीसी को आरक्षण नहीं मिलता है.

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