कभी हिंदुत्‍व की सबसे कट्टर आवाज रहे प्रवीण तोगड़िया को क्‍यों छोड़नी पड़ी VHP?

राम मंदिर आंदोलन और नब्‍बे के दशक में हिंदुत्‍व की सबसे उग्र आवाज माने जाने वाले विश्‍व हिंदू परिषद यानी विहिप (VHP) के नेता प्रवीण तोगड़िया ने शनिवार को इस संगठन को छोड़ने की घोषणा कर दी. तीन दशक से भी लंबे समय तक इस संगठन से जुड़े रहने और इसका पर्याय समझे जाने वाले प्रवीण तोगड़िया के समर्थक प्रत्‍याशी की अध्‍यक्ष पद के चुनाव में हार के बाद उन्‍होंने यह घोषणा की. दरअसल विहिप का अध्‍यक्ष ही अंतरराष्‍ट्रीय कार्यकारी अध्‍यक्ष को चुनता है. अभी तक तोगड़िया ही कार्यकारी अध्‍यक्ष थे. लिहाजा उनके प्रत्‍याशी राघव रेड्डी की हार के बाद ही स्‍पष्‍ट हो गया था कि अब तोगड़िया को हटा दिया जाएगा.

इस कड़ी में विहिप के 52 वर्षों के इतिहास में पहली बार हुए चुनावों में वीएस कोकजे दो तिहाई बहुमत से विहिप के अध्‍यक्ष बने. उन्‍होंने तोगड़िया की जगह आलोक कुमार को अंतरराष्‍ट्रीय कार्यकारी अध्‍यक्ष बनाया है. अब सवाल उठता है कि हिंदुत्‍व के पोस्‍टरब्‍वॉय रहे प्रवीण तोगड़िया को आखिर क्‍यों हटाया गया?

बागी तेवर
दरअसल विहिप, संघ का ही एक आनुषांगिक संघटन है. इसलिए कहा जा रहा है कि तोगड़िया के खिलाफ बगावत में संघ का समर्थन भी रहा है. ऐसा इसलिए क्‍यों‍कि संघ उनकी हालिया कार्यशैली से खुश नहीं था. सूत्रों के मुताबिक संघ इस बात से असहज था कि वीएचपी के बैनर का इस्‍तेमाल कर तोगड़िया लगातार मोदी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे थे. तोगड़िया लगातार बीजेपी सरकार पर हिंदुत्‍व के मुद्दे पर नरम रुख अख्तियार करने का आरोप लगा रहे थे. तोगड़िया ने आरोप लगाते हुए कहा था कि बीजेपी ने संसद में बहुमत हासिल करने के बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने के लिए कानून बनाने के 1989 के अपने पालमपुर प्रस्ताव पर पलटी मार ली है. तोगड़िया ने कहा कि न तो कोई विकास हुआ और न ही सरकार ने पिछले चार वर्षों में राम मंदिर का निर्माण किया. उन्होंने कहा कि सरकार सभी मोर्चों पर असफल हो गई है.

ऐसे में 2019 के चुनाव से ऐन पहले तोगड़िया के रास्‍ते से हटने का सीधा मतलब है कि संघ और सरकार चुनाव के दौरान एक सुर और एक लय-ताल बनाए रखना चाहते हैं और इसके साथ ही संघ ने स्‍पष्‍ट संकेत दे दिया है कि के किसी भी संगठन की तरफ से मोदी सरकार के खिलाफ बगावत बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी.

प्रवीण तोगड़िया और नरेंद्र मोदी
दोनों ही नेता गुजरात से ताल्‍लुक रखते हैं. प्रवीण तोगड़िया ने एक इंटरव्‍यू में कहा भी है कि 1972 से उनकी पीएम मोदी से दोस्‍ती रही है. गुजरात में एक जमाने में दोनों ही नेता एक ही स्‍कूटर में घूमते थे. तोगड़िया 1983 में विहिप और मोदी 1984 में बीजेपी में भेजे गए. 2001 में नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के सीएम बने. उस दौरान भी दोनों नेताओं के संबंध मधुर रहे लेकिन बाद में उनके रिश्‍तों में गर्मजोशी खत्‍म होती गई. अब कहा जा रहा है कि पीएम मोदी की लगातार आलोचना तोगड़िया को भारी पड़ी. नतीजतन उनका विहिप से नाता टूट गया.

कभी गुजरात में बड़ी ताकत हुआ करते थे तोगड़िया
इससे पहले इसी साल जनवरी में प्रवीण तोगड़िया उस वक्‍त अचानक सुर्खियों में आ गए, जब एकाएक वे ‘लापता’ हो गए. कई घंटों तक ‘लापता’ रहने के बाद तोगड़िया बेहोशी की हालत में अहमदाबाद के एक पार्क में मिले, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया. इसके बाद उन्‍होंने एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करते हुए अपने एनकाउंटर की साजिश रचे जाने के सनसनीखेज आरोप लगा डाले. उन्‍होंने इंटेलीजेंस ब्‍यूरो (आईबी) पर भी लोगों को धमकाने के आरोप लगाए.

प्रवीण तोगड़िया का जन्‍म 12 दिसंबर 1956 को गुजरात के अमरेली जिले के साजन टिंबा गांव में हुआ था.
10 साल की उम्र में वे अहमदाबाद आ गए और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ गए.
तोगड़िया सौराष्ट्र के किसान परिवार में जन्मे और पटेल समुदाय से आते हैं.
उन्‍होंने बचपन से ही संघ की शाखाओं में जाना शुरू कर दिया था.
1971 में 16 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गए.
उन्‍होंने प्रचारक रामेश्वर पालीवाल रे के मार्गदर्शन में स्वयंसेवक के रूप में अपना जीवन शुरू किया.
तोगड़िया मेडिकल के स्टूडेंट भी रहे और उन्होंने पहले MBBS और फिर एमएस की पढ़ाई पूरी की.
1983 में सिर्फ 27 साल की उम्र में प्रवीण तोगड़िया विहिप से जुड़े.
राम मंदिर आंदोलन में उनकी भूमिका को देखते हुए उन्हें वीएचपी का महासचिव बनाया गया.
अशोक सिंघल के निधन के बाद तोगड़िया को वीएचपी का अध्यक्ष बनाया गया.
वीएचपी के भारत और विदेश में करीब 20 लाख सदस्य हैं.
वीएचपी के अपने व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद तोगड़िया एक डॉक्टर में रूप में काम करते रहे.
तोगड़िया महीने में एक हफ्ते रोगियों की जांच के लिए देते हैं.
अहमदाबाद में उन्होंने धनवंतरी अस्पताल की स्थापना भी की है.
प्रवीण तोगड़िया अटल बिहार वाजपेयी सरकार में अपने त्रिशूल दीक्षा कार्यक्रम को लेकर काफी विवादों में रहे.
एक समय ऐसा था कि जब गुजरात में सरकार किसी की भी हो, लेकिन तोगड़िया वहां बड़ी ताकत हुआ करते थे.
बाद में नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद उनके रुतबे में कमी आई.
2002 में गुजरात के तत्कालीन सीएम मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि तोगड़िया सरकार के कामकाज विशेषकर गृह विभाग के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.
उनके ऊपर विवादित बयानों के खिलाफ कई सारे मामले भी दर्ज हैं.

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