त्‍वरित टिप्‍प्‍णी : अमित शाह के ‘नए संपर्कों’ से 2019 में नई दिखेगी बीजेपी

publiclive.co.in[Edited by विजय दुबे ]

नई दिल्ली: बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इस हफ्ते से समर्थन के लिए महासंपर्क अभियान शुरुकर बीजेपी के चुनाव अभियान को एक नई दिशा दी है. इस अभियान की सबसे खूबसूरत बात यह है कि सत्ता प्रतिभा को अपने दरबार में नहीं बुला रही है, बल्कि खुद चलकर उनके द्वार तक जा रही है. यह एक ऐसी पहल है जो खांटी देसी है, लोगों के मन को छूने वाली है और उनके अहम को तुष्ट करने वाली है. ऐसे में अपने क्षेत्र के नामी लोग -आवत जात पनहियां टूटीं- वाला उलाहना भी नहीं दे पाएंगे. राजनीति में समर्थन के लिए यही सब चीजें तो चाहिए होती हैं.

शाह अब तक जिन लोगों से मिले, उनमें अगर बाबा रामदेव को छोड़ दें तो पूर्व सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग, संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कपिल देव, माधुरी दीक्षित और रतन टाटा जैसे लोगों ने खुद को न सिर्फ पिछले चार साल में बल्कि अपने पूरे कैरियर में राजनीति से दूर बनाकर रखा हुआ है. ये लोग किसी सम्मान समारोह में नेताओं से मिल लें, तो अलग बात है, लेकिन वे किसी के लिए वोट मांगने नहीं गए. शाह जल्द ही भारत रत्न लता मंगेशकर और पूर्व क्रिकेट कप्तान सौरव गांगुली से भी मिल सकते हैं. उनकी लिस्ट में इस श्रेणी के बहुत से नामी-गिरामी चेहरे शामिल हैं. अगर गांगुली से शाह की मुलाकात होती है तो यह दिलचस्प होगा, क्योंकि 2014 लोकसभा में गांगुली ने बीजेपी के टिकट से लड़ने का प्रस्ताव ठुकरा दिया था. यह पूरा काम प्रत्यक्ष न होकर चैनल्स के माध्यम से हुआ था.

इन मुलाकातों का गहरा असर होने की पूरी उम्मीद है. पहली बात तो यह कि अगर ये लोग 2019 लोकसभा चुनाव में खुलकर बीजेपी का समर्थन नहीं भी करेंगे, तो कम से कम कोई दूसरी पार्टी तो इन्हें अपने पाले में नहीं ही खींच पाएगी. दूसरी चीज यह होगी कि जब खुद बीजेपी अध्यक्ष उनके घर आकर चार साल की उपलब्धियां गिना जाएंगे तो ये लोग सोशल मीडिया अन्य किसी जगह बीजेपी की आलोचना करने से पहले दो बार सोचेंगे जरूर.और कहीं तीसरी बात हो गई और इनमें से आधे लोग भी बीजेपी के मंच पर आने को राजी हो गए तो मोदी के दाएं हाथ की बहुत बड़ी कामयाबी होगी. कामयाबी इसलिए होगी क्योंकि 2014 के पहले जो चर्चित चेहरे पार्टी के साथ जुड़े थे, 2019 तक आते-आते उनमें से ज्यादातर की चमक उतर गई है. मंत्री बनने के बाद राज्यवर्धन राठौर बाकी मंत्रियों की तरह ही दिखने लगे हैं और ओलंपिक में तिरंगा फहराते हीरो की उनकी छवि जनता के बीच से छीज गई है. यही हाल पूर्व सेनाध्यक्ष वीके सिंह, मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे सत्यपाल सिंह, सिने तारिक हेमा मालिनी, गायक बाबुल सुप्रियो और दूसरे लोगों का है. अनुपम खेर और अक्षय कुमार जैसी फिल्मी हस्तियां इतने मौकों पर सरकार के साथ खड़ी दिख चुकी हैं कि अगर वे बीजेपी के लिए वोट मांगेंगी तो उसमें कोई नयापन नहीं होगा. उलटे, उन्हें जनता के कई तरह के सवालों को जवाब और देना पड़ेगा.

ऐसे में अगर कपिल देव या माधुरी दीक्षित जैसे कद्दावर लोग पहली बार राजनीति के मंच पर आकर मोदी के पक्ष की बात करेंगे तो उसमें मौलिकता होगी और एक नया मुहावरा होगा. बीजेपी के प्रति अनमना हो रहा वोटरों का एक तबका फिर सोच सकता है कि अगर रतन टाटा और माधुरी दीक्षित भी मोदी के साथ खड़े हैं, तो अभी उन्हें एक मौका और दिया जाना चाहिए. ये हस्तियां जब टीवी डिबेट या अखबारों के इंटरव्यू देंगी तो उनसे मोदी के चार साल के बारे में नहीं पूछा जाएगा, बल्कि मीडिया की जिज्ञासा यह पूछने में होगी कि मोदी की किस बात ने आपको उनके साथ आने के लिए प्रेरित किया. यह सब मिलकर प्रचारतंत्र का नया तानाबाना बुन सकता है.

ये लोग जब अपने इंटरव्यू में यह बताया करेंगे कि अमित शाह खुद चलकर उनके घर आए तो उन्हें और उनके परिवार को कैसा लगा, तो ये बातें टीवी रियलटी शो की तरह लोगों को लुभा सकती हैं. इसके साथ ही बीजेपी के प्रवक्ता दावा करेंगे कि नेहरू जी के जमाने से राहुल गांधी तक कांग्रेस के लोगों ने किसी का सम्मान नहीं किया और वे तो प्रतिभाओं को अपने दरबार में बुलाया करते थे, तो चुनाव के लिए जरा बढ़िया सपनीला माहौल बनेगा. उस माहौल में कांग्रेस यह दलील देती रह जाएगी कि नहीं, नेहरू तो महाकवि निराला जी का बड़ा ख्याल रखते थे और इंदिरा गांधी बांग्लादेश युद्ध के सैनिकों से उनके घर जाकर मिलती थीं और राहुल गांधी दिग्गज हस्तियों तो क्या गरीब किसान के घर तक जाते रहे हैं. लेकिन ताजा विजुअल्स वाली अमित शाह की मुलाकातों के आगे कांग्रेस की ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें कितनी टिक पाएंगी कहना मुश्किल है.

और अमित शाह ने यह काम लोकसभा चुनाव से कोई एक साल पहले शुरू कर दिया है. अभी उनके पास काफी समय है. वे जिस तरह के रणनीतिकार हैं, उसमें बहुत संभव है कि वे कम से कम एक ऐसी ‘टेस्‍ट इलेवन’ तैयार कर लें, वह जब मोदी के इर्द-गिर्द खड़ी हो तो बीजेपी की एकदम नई तस्वीर दिखाई देने लगे. यह तस्वीर देश के शहरी मध्यमवर्ग और युवाओं को खासा लुभा सकती है. हालांकि देश के ग्रामीण समुदाय पर इसका कितना असर होगा यह कहना मुश्किल है. लेकिन फिलहाल इस पहल से अमित शाह ने खुद की छवि एक दबंग प्रबंधक के साथ ही विनम्र राजनेता की बना ली है. जो सत्ता के शिखर के साये में खड़ा होकर भी, अकड़ने के बजाय झुकना जानता है. वैसे भी भारतीय वोटर की सबसे बड़ी तसल्ली यही होती है कि चुनाव के बहाने पांच साल में कम से कम एक बार नेता उसके घर आकर उसके पांव छूता है. और यहां तो बड़ा नेता, बड़े वोटर के यहां जा रहा है.

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