त्वरित टिप्पणी: बंगले से निकले इमोशनल अखिलेश का धोबी पछाड़

publiclive.co.in [ Edited By रवि यादव ]

नई दिल्ली: असंभव को साधने की कला का नाम राजनीति है. लखनऊ के अपने पूर्व आवास को लेकर मचे बखेड़े पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव जब प्रेस कॉन्फ्रेंस करने निकले तो लगा कि इस कला में अब वे भी माहिर हो गए हैं. बंगला और उसमें की गई कथित तोड़फोड़ को लेकर अब तक सारा प्रचारतंत्र यही बता रहा था कि अखिलेश ने किस तरह से सरकारी संपत्ति को पहले भोगा और फिर बरबाद करके चले गए. इस पूरे घटनाक्रम पर अखिलेश ने सतर्क चुप्पी बनाए रखी.

अखिलेश की आक्रामकता
लेकिन आज जब वे नल की दो टोंटियां जेब में डालकर मीडिया के सामने आए और भरे गले से भावुक अंदाज में अपनी बात कहने लगे तो लगा कि वे घर पर छिड़े विवाद से निपटने का होम वर्क कर रहे थे. एक ऐसी प्रेस कॉन्फ्रेंस जिसमें उन्हें सवालों से घिरे होकर, बचाव की मुद्रा में आना था, वहां वे पूरी तरह आक्रामक नजर आए. और अदा तो यह कि जहां उन्हें तोड़फोड़ की सफाई देनी थी, वहां वे एक-एक प्रोजेक्ट गिनाकर सबको बता गए कि असली विकास पुरुष तो वही हैं. राजनीति में अपने सबसे खराब समय को इस तरह एक जबरदस्त अवसर में बदलकर, अखिलेश ने बंगले को 2019 की लड़ाई का यलगार बना दिया.

‘दिल में गुस्सा, जुबान पर दर्द’
उनका आज का संवाद आज तक के उनके सारे संवादों से अलग था. उनके दिल में गुस्सा और जुबान पर दर्द था. उन्होंने जिस तरह कहा कि टोंटियां गजेंड़ी, भंगेड़ी और स्मेकिये उखाड़ते हैं. उसमें कोई लाग-लपेट नहीं थी. लेकिन एक बंगले के बहाने उन्होंने सीएम योगी से लेकर पीएम मोदी तक और ब्यूरोक्रेसी से लेकर राजभवन तक सबको लपेट लिया. बंगले के बहाने उन्होंने गठबंधन राजनीति की चर्चा कर ली और 2019 में प्रधानमंत्री कैसे बनाना है, यह भी बता दिया.

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ऐसा नहीं है कि ये सब बातें वे पहले नहीं कहते रहे हैं, लेकिन पहले उनके भाषणों में संवाद होता था, दर्द नहीं. आज वे एक पीड़ित की तरह जनता के बीच आए. और यह भारतीय समाज की खासियत है कि जब उसे कोई पीड़ित और कातर दिखाई देता है तो समाज की सहानुभूति उसके साथ हो जाती है. यह सहानुभूति, संदेश के जनता तक पहुंचने में एक ऐसा सरपट हाईवे बनाती है, जिसकी तलाश हर राजनेता को होती है. आज अखिलेश की आवाज को संप्रेषण का वह हाईवे मिल गया.

गठबंधन का गणित
उन्होंने ठोककर कहा कि यूपी में गठबंधन हर हाल में होगा. इसके लिए वह हर त्याग करने को तैयार हैं. अखिलेश ने कहा कि राज्यपाल के अंदर संविधान की नहीं, आरएसएस की आत्मा है. बात बंगले की तोड़फोड़ की थी, लेकिन कम से कम चार बार उन्होंने सवालों को अपने हिसाब से ढाल कर बात को बंगले से निकालकर आरएसएस तक पहुंचा दिया.

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जिस सरकारी गेस्ट हाउस में वे अब रह रहे हैं, वहां के पर्दों के बारे में उन्होंने कह दिया कि उन्हें भगवा रंग पसंद नहीं है, उन्होंने सफेद पर्दे लगाए हैं. और यहीं जोड़ दिया कि वे जब गेस्ट हाउस से जाएंगे तो अपने गद्दे और पर्दे ले जाएंगे. इस छोटे से वाकये के माध्यम से उन्होंने बीजेपी की राजनीति पर कटाक्ष कर लिया और साथ ही यह भी बता दिया कि सरकारी बंगले से अपना सामान ले जाना गुनाह नहीं है, सामान्य प्रक्रिया है.

हर खेल में माहिर
प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब-जब बंगले के स्विमिंग पूल का जिक्र आया तो अखिलेश ने ललकारा कि स्विमिंग पूल था कहां. फिर वे बैडमिंटन कोर्ट पर चले गए. फिर उन्होंने एक्सरसाइज की बात की. और फिर उन्होंने खुद को भगवान राम का नाम लिए बिना ऐसे राजकुमार की तरह पेश किया जिसे घर से निकाल दिया गया है और बाहर की दुनिया में जिसे जीने नहीं दिया जा रहा. उन्होंने कहा कि मैं जवान आदमी हूं, एक्सरसाइज करता हूं, खेलता हूं, हर तरह का खेल खेल लेता हूं. आइये आपको मेरे साथ कौन सा खेल खेलना है, हर खेल में आपको हरा दूंगा. यह आखिरी लाइनें वे पीएम मोदी और सीएम योगी के लिए बोल रहे थे. साथ ही चार उपचुनावों में बीजेपी की हार का संदर्भ ले रहे थे.

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उन्होंने जिस तरह कहा कि सड़क पर आप चलने नहीं देते हैं. गोमती रिवर फ्रंट पर साइकिल चलाता हूं तो लोग घेर लेते हैं. आखिर कितनी सेल्फी खिंचाऊं. क्या मुझे घर में इनडोर खेल खेलने का हक नहीं है. खेल की ये बातें करते-करते उन्होंने याद दिलाया की उन्होंने युवाओं को लेपटॉप दिए. फिर याद दिलाया की उन्हीं युवाओं को आज लखनऊ में लाठियां मिल रही हैं, जिन्हें उनके राज में अवसर मिलते थे. अपनी पीड़ा को पूरे युवाओं की पीड़ा बनाकर, अखिलेश ने भावुक अपील की.

अखिलेश ने आज उस हुनर का मुजाहरा किया, जिसमें अब तक निर्विवाद रूप से बीजेपी की महारथ रही है. अब तक बीजेपी को चाहे किसी बात की चिंता रही हो, लेकिन यह फिक्र कभी नहीं करनी पड़ी कि उसके पास भावनाओं को उभारने वाले वक्ता नहीं है. यही वह फ्रंट है, जिस पर जननेताओं में सिर्फ लालू यादव ही बीजेपी को टक्कर दे पाते थे. लेकिन उनके अंदाज में सधा हुआ गंवईपन था, जिसका मजाक उड़ाने में भद्र लोक को मजा आता था. लेकिन अखिलेश ने यह गुंजाइश भी नहीं छोड़ी. उन्होंने जिस तरह से खुद को एक पर्यावरणविद की तरह पेश कर दिया और हर सवाल का कड़क जवाब दिया, उसमें मजाक बनाने की गुंजाइश कम है.

अखिलेश को डेढ़ साल पहले घर में शुरू हुई कलह के कारण ही सत्ता से हटना पड़ा था, आज घर पर ही छिड़ी नई किस्म की कलह को वे सत्ता में वापसी का रास्ता बना रहे हैं. यही तो भारतीय राजनीति की महिमा है. कभी गाड़ी नाव पर और कभी नाव गाड़ी पर.

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