करुणानिधि को क्यों कहा जाता था कलैगनार

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भारत की वर्तमान राजनीति में करुणानिधि चंद ऐसे नेताओं में शुमार हैं, जिन्होंने इस क्षेत्र में अपार सफलताएं हासिल की और 90 से ज्यादा वसंत भी देखे. उनके निधन से दक्षिण की राजनीति में जो शून्य आया है उसे भर पाने में लंबा वक्त लगेगा.

करुणानिधि राजनीति में आने से पहले तमिल सिनेमा में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे. वहां उनकी पहचान एक धुरंधर पटकथा लेखक के रूप में थी. फिल्मों में पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले करुणानिधि को समाजवादी और बुद्धिवादी आदर्शों को बढ़ावा देने वाली ऐतिहासिक और सामाजिक (सुधारवादी) कहानियां लिखने के कारण जोरदार कामयाबी मिली.

दक्षिण में सिनेमाई हस्तियों को बेहद सम्मान दिया जाता है और कई की पूजा भी की जाती है. इन्हीं पूज्यनीय फिल्मी हस्तियों में करुणानिधि भी शामिल रहे. सिनेमाई कामयाबी, जबर्दस्त मेहनत और चतुर दिमाग ने उन्हें राजनीति में अपार सफलता दिलाई और तमिलनाडु में 5 बार (1969–71, 1971–76, 1989–91, 1996–2001 और 2006–2011) मुख्यमंत्री भी रहे.

उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म राजकुमारी से लोकप्रियता हासिल की. उनके द्वारा लिखी गई करीब 75 पटकथाओं में राजकुमारी, अभिमन्यु, मंदिरी कुमारी, मरुद नाट्टू इलवरसी, मनामगन, देवकी, पराशक्ति और तिरुम्बिपार आदि शामिल हैं.

करुणानिधि को उनकी बहुमुखी प्रतिभा के कारण कलैगनार भी कहा जाता है. यह नाम उन्हें उनके प्रशंसकों की ओर से दिया गया था. कलैगनार का अर्थ होता है ‘कला का विद्वान.’ इसके अलावा उन्हें मुथामिझ कविनार भी कहा जाता है.

कलैगनार उपनाम उनके लिए पूरी तरह से फिट भी बैठता है क्योंकि वह कई क्षेत्रों में बेहद कामयाब रहे. वह सफल राजनेता, मुख्यमंत्री, फिल्म लेखक, गीतकार, साहित्यकार होने के साथ ही पत्रकार, प्रकाशक और कार्टूनिस्ट भी रहे. उनके करियर की सबसे खास बात यह रही कि जीवन के 94वें पड़ाव पर भी वह राजनीति में बेहद सक्रिय रहे.

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