यूपी में लागू होगा अग्रिम जमानत का प्रावधान, जानिए राज्य सरकार ने SC में क्या कहा

publicllive.co.in [EDITED BY SIDDHARTH SINGH]

नई दिल्ली: यूपी और उत्तराखंड में अग्रिम जमानत का प्रावधान न होने के मामले में शुक्रवार (31 अगस्त) को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि प्रदेश में अग्रिम जमानत का प्रवाधान को लागू करने के लिए राज्य सरकार ने संशोधित बिल को पास कर लिया है और जल्द ही बिल कानून का रूप लेगा. वहीं, दूसरी ओर उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संशोधन बिल पास करने की प्रक्रिया जारी है.

इसके लिए उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से 6 हफ्ते का समय मांगा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई 6 हफ्ते के लिए टाल दी. दरअसल, वकील संजीव भटनागर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अग्रिम जमानत के प्रावधान देश के अन्य राज्यों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी लागू करने की मांग की है.

6 हफ्ते का दिया था समय
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार को 6 हफ्ते में जवाब के लिए आखिरी मौका दिया था. यूपी सरकार ने अग्रिम जमानत के मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट से और समय की मांग की थी. राज्य सरकार यह निर्णय लेना था कि राज्य अपराध संहिता (यूपी) संशोधन विधेयक, 2010 को विधानसभा में पेश किया जाए या नहीं. इस विधेयक को राष्ट्रपति ने सितम्बर 2011 में तकनीकी आधार पर वापस कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में संजीव भटनागर नामक एक वकील द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है.भटनागर ने अपनी याचिका में कहा है कि अग्रिम जमानत के प्रावधान देश के अन्य राज्यों की तरह ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी लागू होने चाहिए.

क्या है पूरा मामला
दरअसल, यूपी में अभी अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है. अभी तक लोगों को गिरफ्तारी पर अग्रिम जमानत लेने के लिए सीधे हाईकोर्ट जाना पड़ता है, जिस पर यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि अग्रिम जमानत का बिल पेश करेंगे. दरअसल, आपातकाल के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने 1976 में सीआरपीसी को संशोधित कर अग्रिम जमानत के प्रावधान को वापस ले लिया था. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलावा देश के सभी राज्यों में अग्रिम जमानत के प्रावधान लागू हैं. हालांकि, मायावती की सरकार ने राज्य में 2010 में संशोधन कर अग्रिम जमानत को दोबारा लागू करने संबंधी विधेयक को विधानसभा से पास किया पर राष्ट्रपति ने इसे तकनीकी आधार पर वापस कर दिया. उसके बाद से उत्तर प्रदेश की सरकार इस विधेयक को जरूरी संशोधन के साथ दुबारा पास नहीं करा पाई है.

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