स्मृतिशेष विष्णु खरे : चला गया प्रिय कवि और विदाई वेला में बिखर गई कविता

publiclive.co.in[Edited by RANJEET] देश के प्रतिष्ठित कवि विष्णु खरे का आज शाम दिल्ली में निधन हो गया. वह कुछ समय से गंभीर रूप से बीमार थे. कवि की चिर विदाई का समाचार आते ही साहित्य जगत और शब्दों से वास्ता रखने वाले लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें भावुक विदाई दी.

कवि मंगलेश डबराल ने अपने फेसबुक वॉल पर कविता लिखी:
अलविदा विष्णु जी…
‘मैं देखना चाहता हूँ चिड़िया को उस क्षण में
जब वह आख़िरी उड़ान से पहले अपने आप निश्चित करती है
कि वह उसकी आख़िरी उड़ान है
और बिलकुल पहले ही की तरह
उड़ जाती है घड़ियों और नक्शों के बाहर
उस जगह के लिए जहां एक असम्भव वृक्ष पर बैठकर चुप होते हुए
उसे एक अदृश्य चिड़िया बन जाना है
देखना ही चाहता हूँ
क्योंकि न मैं चिड़ियों का संकल्प पा सकता हूँ और न उड़ान
मैं सिर्फ अपनी मृत्यु में उनकी कोशिश करना चाहता हूँ.’–विष्णु खरे.
–अलविदा प्रिय कवि.

वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा:
‘‘विष्णु खरे की दुखद विदाई के साथ ही हिंदी ने एक ऐसा कवि और आलोचक खो दिया जो हमेशा सत्य और न्याय के साथ खड़ा रहा. उनकी कविता में वह दुर्लभ प्रतिभा थी जो मानवीय संवेदना को छूती थी. यह संवेदना शहरी जीवन की तकलीफों, गैरबराबरी और मानवीयता से बावस्ता थी. उन्हें हमारे वक्त की राजनीति की बहुत गहरी समझ थी. वह इसके विरोधाभासों और परतों को न सिर्फ समझते थे बल्कि स्वतंत्रता, समानता और न्याय के दृष्टिकोण की कसौटी पर उसे कसते भी थे.’’

फिल्म समीक्षक और कवि यतींद्र मिश्र ने कवि को कुछ इस तरह याद किया:
खरे से विष्णु जी..
नमन
कविता से अलग उनके फ़िल्म संगीत के दुर्लभ जानकर की हैसियत ने हमेशा हैरान किया. एक उनसे और दूसरे विजय मोहन सिंह जी से पिछली सदी के पचास और साठ के दशक के हिन्दी फ़िल्म संगीत के बारे में बहुत सुना, सीखा और जाना है. लता जी जब अस्सी बरस की हुयीं थीं,तब तहलका के एक विशेष अंक के लिए उन्होंने मेरे आग्रह पर प्रेम और उत्साह से लिखा था. कुंवर नारायण जी के ग्रेटर कैलाश वाले घर में उनके और कुंवर जी के साथ एक शाम घण्टों सिर्फ़ फ़िल्म और भक्ति संगीत पर चर्चा होती रही. मुझे आज भी उनका उत्साह से भरकर ‘मुगल-ए-आज़म’ की नात ‘बेकस पे करम कीजिए सरकार-ए-मदीना’ गाकर भाव-विह्वल भाव से सुनाना याद है.विष्णु जी की फिल्मों के बारे में जानकारी और संगीत की समझ अदभुत थी.

एक यशस्वी और निर्भीक कवि की बड़ी छवि से अलग उनका रसिक भाव भी हमेशा याद आएगा.फ़ोन पर हमेशा ही बड़े प्रेम से लम्बी बातें करते हुए उन्होंने विश्व कविता की दुर्लभ जानकारियाँ साझा की थीं, जैसे नवोदित लोगों को कुछ सिखाने में आनंद पाते हों.आज भी उनका मुझे फ़ोन पर घण्टे भर तक चली लम्बी बातचीत में मराठी के ‘भाव-गीत’ के बारे में कुछ बताना नहीं भूलता. ऐसे लोग धीरे धीरे जा रहे हैं. एक बड़ा कवि आज चुपचाप चला गया. हम आप अब ऐसे प्रबुद्ध और मूर्धन्य शख्सियतों को खोते जा रहे हैं. वो जगहें भी धीरे धीरे खाली होती जा रहीं हैं. उनकी बेबाक और बेधक कविताएं याद आती रहेंगी. उनका गाया हुआ
गीत, हमेशा स्मरण में गूंजता रहेगा.

पत्रकार अजीत वडनेडकर ने कवि को राजनैतिक संदर्भों में याद किया. उन्हें ‘विष्णु खरे और गोंडवानालैंड’ शीर्षक से फेसबुक पोस्ट लिखी:
“कुछ अर्सा पहले सुबह सुबह उनका फोन आया. सुखद आश्चर्य था. हमेशा की तरह उनकी व्यग्र और हैरत भरी तार सप्तक वाली आवाज़ थी-“अरे तुम झांसी में हो !!!” मैने सहमति जताई और कहा कि आपने झांसी में ही फोन मिलाया है. सुनते ही बॉस ने झिड़क दिया. झांसी में कौन फोन मिलाता है !! मैने तो नम्बर मिलाया है. अपन लाजवाब हो गए. ख़ैर, पता चला कि दिल्ली से बोल रहे हैं और देर रात झांसी से गुज़रे थे तब अमर उजाला खरीदा था.

उनके चाहने वालों में ख़ासी तादाद में पत्रकार भी थे. जब भी सफर में होते, प्रायः हर बड़े शहर में वहाँ के स्थापित अखबार ज़रूर खरीद लेते. उनकी आदत थी प्रिंट लाइन देखने की. इससे जान जाते कि किस अखबार में कौन सम्पादक है. उनका अपना कोई हुआ, ऐसे में पता चल जाता था. बीते दिनों जब मैं वाराणसी में था तब मुलाकात हुई थी. मेरे कार्यकाल में वे दो बार बनारस आए थे.

बड़ी दिलचस्प बातें शुरू हुईं.
मैने कहा झांसी आइये बॉस, बोले मेरा तो घर है. अपने निकट सम्बन्धियों के बारे में बताने लगे. बोले आना है मिलने. तुमने झांसी आने की खबर नहीं दी. ख़ैर कई तरह की बातें हुईं. खाप पंचायत, जातीय राजनीति से होते हुए बात नृतत्वशास्त्र तक पहुँची. कहने लगे इस देश में कोई आदिवासी राज्य है !!! छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, तेलंगाना में से गोंडवानालैंड निकल आएगा. सारे नक्शे बेकार है.

बोले, गोंडवानालैंड समझते हो न !! मैने ज्ञान बघारते हुए कॉंटिनेंटल ड्रिफ्ट और पैंजिया जैसे भारी भरकम तीर चलाए. उन्होंने फिर झिड़क दिया. कहा, वह थ्योरी अपने पास रखो. उस जर्मन को गोंडवानालैंड शब्द कहाँ से मिला था !! वहीं से जहां, जहां आज गोंड हैं. द्रविड़ हैं. वहीं पर गोंडवानालैंड बनना चाहिए. गोंडवाना में गोंड और वन को पकड़ो. आदिवासी और जंगल को पकड़ो. तुम शब्दो की यात्रा करते हो, इसलिए खास तौर पर इसे समझो. मैं अवाक था !!

उनकी हर बात विस्मित करती थी. उनकी हर मुलाकात यादगार होती. यह उनसे अन्तिम संवाद, जिसे फ़ेसबुक पर साझा करता, पर अब यह पुण्यस्मरण है. बॉस छिंदवाड़ा के थे. डेढ़ दो बरस पहले तक मुम्बई से दूर वहीं रह रहे थे. छिंदवाड़ा ठेठ आदिवासी इलाका है. भोपाल से मुहब्बत थी, पर इधर कुछ कुपित भी दिखते थे. गर्मदल के स्वतन्त्र कार्यकर्ता थे. उन्हे राजी करना कठिन था. आवेगी थे, मगर तत्काल संभलते थे. माहौल में सरगर्मी पैदा कर देते. कम लोग उनकी उम्र में ऐसे सक्रिय होते हैं जैसे वे थे. इधर फिर दिल्ली रहने लगे थे तो मिलना आसान था, पर अब हो न पाएगा. मेरे निकट थे. कई स्तरों वाला रिश्ता था. बेजोड़ कवि, आलोचक, सम्पादक …सलाम बॉस.

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