उम्मीदवारी की उम्रसीमा कम करने की जरूरत पर बहस जरूरी : मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त

publiclive.co.in[Edited by Ranjeet]
राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में युवाओं की बढ़ती भूमिका को देखते हुये कानून बनाने की प्रक्रिया (विधायन) में भी युवाओं की सक्रिय भागीदारी को जरूरी मानते हुये चुनाव लड़ने के लिये उम्मीदवारी की मौजूदा उम्रसीमा कम करने की जरूरत, गंभीर बहस के दायरे में है. निवर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत भी इससे इत्तेफाक रखते हुये मानते हैं कि इस विषय पर बहस शुरु करने का यह माकूल समय है. पेश हैं, पिछले साल 23 जनवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार संभालने के बाद रविवार को अपना कार्यकाल पूरा कर रहे रावत से भाषा के पांच सवाल :

प्रश्न : कार्यभार संभालने के बाद आपने सांसद और विधायक बनने के लिये न्यूनतम उम्र सीमा 25 साल से घटाकर 18 साल करने की जरूरत पर बल देते हुये कहा था कि इस पर बहस होनी चाहिये. आपके कार्यकाल में इस पर बहस कितनी आगे बढ़ी और क्या इस दिशा में कोई सार्थक पहल हो सकी ?
उत्तर : मैंने यह नहीं कहा था कि विधायिका का सदस्य बनने के लिये उम्रसीमा 25 साल से घटाकर 18 साल करना चाहिये. मैंने कहा था कि प्रतिनिधि चुनने का अधिकार 18 साल की उम्र में मिल जाता है और प्रतिनिधि बनने का अधिकार 25 साल में मिलता है. मुझे लगता है कि इस पर पुनर्विचार की जरूरत है कि क्या इसे कुछ कम किया जा सकता है. अगर हम किसी को चुनने के लिये इतने परिपक्व हैं तो निश्चित रूप से बनने के लिये भी परिपक्व हैं. इस पर अब बहस होनी चाहिये कि नीति निर्धारण और विधायन में युवाओं की भागीदारी बढ़ाई जाये.

प्रश्न : चुनाव दर चुनाव, उम्मीदवारों की लगातार बढ़ती संख्या चिंता का विषय है. पिछले चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि 85 फीसदी उम्मीदवार जमानत तक नहीं बचा पाते. चुनावी जोड़ तोड़ के लिये उम्मीदवार उतारने का बढ़ता चलन क्या निर्वाचन प्रक्रिया के मकसद को विफल नहीं कर रहा है और आयोग इसे रोकने के लिये क्या कुछ कर सकता है?
उत्तर : इसे रोकने के लिये आयोग कुछ नहीं कर सकता. लोकतंत्र में सभी को चुनाव लड़ने का अधिकार है. चुनावी जोड़ तोड़ के लिये उम्मीदवारों को खड़ा करना एक कड़वा सच भी है. इसके पीछे राजनीतिक दलों या अन्य लोगों द्वारा छद्म उम्मीदवार खड़े करने जैसे हथकंडों पर नजर रखना चाहिए और इसे रोका जाना चाहिये. यह जरूरी है कि उम्मीदवार अगर गंभीर नहीं है या प्रायोजित उम्मीदवार है तो इस तरह की चीजों को हर हाल में रोका जाना चाहिये.

प्रश्न : विधायिका के सदस्यों की आय के ज्ञात स्रोतों से अन्य स्रोतों पर निगरानी के लिये प्रणाली बनाने के उच्चतम न्यायालय के आदेश के पालन हेतु, हाल ही में निर्वाचन आयोग सहित अन्य पक्षकारों ने प्रयास शुरु किये हैं। इस दिशा में कितनी प्रगति हुई है?
उत्तर : इस दिशा में सभी को मिलकर काम करना है. मौजूदा व्यवस्था में आयोग केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड से विधायिका के सदस्यों की संपत्ति और आय से जुड़े तथ्यों को सत्यापित कराता है. हम इस प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिये प्रयासरत हैं जिससे इन तथ्यों को जनता के बीच भी रखा जा सके. इसके लिये विचार विमर्श जारी है.

प्रश्न: राजनीतिक दलों के चंदे की प्रक्रिया पारदर्शी बनाने को आपने प्राथमिकता दी. इसमें कितनी कामयाबी मिल सकी?
उत्तर: यह एक लंबी प्रक्रिया है. इस मामले में सभी राजनीतिक दलों की गत अगस्त में बैठक हुई. इसमें सुझाव दिया गया कि राजनीतिक दलों के खर्च की सीमा तय होनी चाहिए. सिर्फ दो राजनीतिक दलों को छोड़कर सभी दल खर्च की सीमा तय करने पर सहमत हैं. इसलिए मुझे लगता है यह प्रयास जल्द फलीभूत होगा.

प्रश्न: बतौर मुख्य चुनाव आयुक्त अपने कार्यकाल की सबसे अहम उपलब्धि किस काम को मानते हैं और ऐसा कोई अधूरा काम, जिसे आप प्राथमिकता से अंजाम तक ले जाना चाहते हों?
उत्तर: पिछले एक साल में एक के बाद एक हुये चुनाव पूरी निष्पक्षता से सफलतापूर्वक सम्पन्न कराना, खासकर तमाम खतरों के बावजूद छत्तीसगढ़ में शांतिपूर्वक मतदान होना, चुनाव दर चुनाव मतदान प्रतिशत बढ़ना और सबसे अहम बात, चुनावी गड़बड़ी दूर करने में मोबाइल एप ‘सी विजिल’ की मदद से जनता की भागीदारी बढ़ना तथा शिकायतों का शतप्रतिशत निपटारा होना बहुत अहम उपलब्धि है. जहां तक अधूरे काम की बात है तो, बदलते वक्त की जरूरतों के लिहाज से सोशल मीडिया और धन-बल पर प्रभावी नियंत्रण के लिये विधिक उपायों के समग्र पुनरीक्षण का काम अभी पूरा होना शेष है. हमें इसे भविष्य की जरूरतों के मुताबिक बनाना है. इस हेतु मौजूदा कानून की समीक्षा के लिये गठित समिति ने सुझाव भी दे दिये हैं, लेकिन आयोग समयाभाव के कारण इन सुझावों की समीक्षा कर विधि मंत्रालय को इस बाबत सिफारिशें नहीं भेज पाया है. यही एकमात्र मेरा अधूरा काम रहा जिसके लिये मुझे मलाल है.

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