1.60 लाख करोड़ के कर्ज में है मध्य प्रदेश, कर्ज माफी के लिए कहां से आएंगे 50,000 करोड़ रुपये

publiclive.co.in[Edited by Ranjeet]
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शपथ ग्रहण के तुरंत बाद किसानों का दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी. राजनैतिक रूप से यह घोषणा कांग्रेस पार्टी के लिए संजीवनी साबित हो सकती है. लेकिन राज्य सरकार के बहीखातों की सेहत देखकर समझ नहीं आता कि कमलनाथ यह वादा कैसे पूरा करेंगे. कांग्रेस पार्टी और मध्य प्रदेश के अफसरों का फौरी आकलन है कि कर्ज माफी को लागू करने के लिए सरकार को कम से कम 50,000 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे. राज्य सरकार को यह काम ऐसे समय में करना होगा जब मार्च 2016 तक ही मध्य प्रदेश सरकार पर 1.60 लाख करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ चुका था.

राज्य में सत्ता परिवर्तन के साथ ही मध्य प्रदेश की नौकरशाही ने सहकारी और सार्वजनिक क्षेत्र से किसानों को दिए गए कर्ज के आंकड़े जुटाने शुरू कर दिए थे. राज्य स्तरीय बैंकिंग कमेटी एसएलबीसी के अनुसार 31 मार्च 2018 तक मध्य प्रदेश के किसानों पर 75,000 करोड़ रुपये का कर्ज था. इसमें से 46,000 करोड़ रुपये का कर्ज वित्त वर्ष 2017-18 में ही 40 लाख किसानों को बांटा गया. इसके अलावा चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में ही करीब 20,000 करोड़ रुपये का कर्ज किसानों को बांटा गया है. चालू वित्त वर्ष में बांटा गया रिण कर्ज माफी के दायरे में नहीं आएगा. इस लिहाज से देखा जाए तो सरकार को 75,000 करोड़ रुपये के कर्ज में से करीब 50,000 करोड़ रुपये का कर्ज माफ करना है.

अगर सरकार की माली हालत पर नजर डालें तो चालू वित्त वर्ष में सरकार ने 1,86,685 करोड़ रुपये का व्यय रखा है. इसमें से 37,498 करोड़ रुपये पहले से ही कृषि के मद में आवंटित हैं. अब अगर सरकार कर्ज माफी इसी वित्त वर्ष में करती है तो कृषि पर उसका कुल बजट 87,000 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाएगा. इसका मतलब हुआ कि कर्ज माफी करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार को अपने सालाना बजट का आधा हिस्सा सिर्फ खेती पर खर्च करना होगा.

यह रकम आगे चलकर बढ़ भी सकती है. सरकार ने आज जारी आदेश में यह नहीं कहा है कि किस श्रेणी के किसानों का कर्ज माफ होगा. 50,000 करोड़ रुपये का आकलन इस आधार पर किया गया था कि सीमांत किसानों का 2 लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया जाना है. लेकिन आज जारी आदेश से लगता है कि सभी किसानों को दो लाख रुपये तक का कर्ज माफ किया जाना है. अगर सरकार बाद में इस आदेश में ज्यादा किंतु-परंतु लगाती है तो उसे इस बड़े फैसले का सही राजनैतिक फायदा नहीं मिल पाएगा. इस बात पर भी गौर करना होगा कि कर्ज माफी सिर्फ कृषि कर्ज पर दी जाती है या इसके दायरे में कृषि उपकरण भी आते हैं. फिलहाल तो किसान यही मान रहे हैं कि उन पर जितना भी कर्ज हो उसका दो लाख रुपये माफ हो जाएगा.

यही वजह है कि किसानों ने इस बार मध्य प्रदेश में धान की बिक्री भी कम की है. दरअसल धान बेचने पर उनके एकाउंट में धान बिक्री का पैसा आ जाता और इस पैसे में से बैंक अपने कर्ज की किश्त काट लेते. बैंक यह किश्त न काट सकें इसिलए किसानों ने धान को कर्ज माफी की घोषणा होने तक रोक कर रखा है.

कमलनाथ सरकार इस बारे में इतनी सक्रिय है कि मध्य प्रदेश के अधिकारियों का एक दल पहले ही महाराष्ट्र और पंजाब जाकर वहां की गई कर्ज माफी का अध्ययन करके आ चुका है. दल ने मुख्य रूप से यह समझने की कोशिश की कि पंजाब सरकार ने कर्ज माफी का जो पोर्टल तैयार किया था, उसे किस तरह बनाया गया और वह कैसे काम करता है.

वैसे मध्य प्रदेश से पहले उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब कर्ज माफ कर चुके हैं. इनमें से पंजाब की आर्थिक हालत तो मध्य प्रदेश से कहीं ज्यादा खराब थी. उत्तर प्रदेश के बड़ा राज्य होने के बावजूद वहां कर्ज माफी के लिए 36,000 करोड़ की रकम रखी गई थी. इसकी मुख्य वजह यह थी कि उत्तर प्रदेश ने सिर्फ सीमांत किसानों का कर्ज माफ किया था.

जाहिर है मध्य प्रदेश में बाकी सब राज्यों से बड़ी घोषण हुई है, इसलिए यहां सबसे ज्यादा खर्च आने वाला है. और चूंकि अब यह खर्च होना है तो बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और कर्मचारियों के वेतन के बजट पर दबाव बढ़ना तय है. अपनी घोषणा और राज्य की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना ही कमलनाथ की असली चुनौती होगी.

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