जस्टिस रंगनाथ आज हो रहे हैं रिटायर, जजों की नियुक्ति में परिवारवाद-जातिवाद के लगाए थे आरोप

publiclivenews.in[Edited by DIVYA SACHAN]
जजों की नियुक्ति में परिवाद और जातिवाद के आरोप लगाकर पीएम मोदी को चिट्ठी लिखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस रंगनाथ पांडे आज रिटायर हो रहे हैं. जस्टिस पांडेय के कार्यकाल का आज अंतिम दिन है,
जस्टिस पांडे इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में कार्यरत हैं. जस्टिस पांडे 7 जुलाई 17 को हाईकोर्ट में एडिशनल जज के तौर पर एप्वाइंट हुए थे, उन्होंने 17 सितंबर 2018 स्थायी जज की शपथ को ली थी. जस्टिस पांडे ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से 1979 में एलएलबी और 1982 में एलएलएम किया था.

साल 1985 में जस्टिस पांडे पीसीएस (जे) में सेलेक्ट होकर ज्यूडिशियल सर्विसेज में आए थे. वह साल 2001 में हायर ज्यूडिशियल सर्विस और 2014 में डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर प्रमोट हुए थे, जस्टिस रंगनाथ पांडेय ने रिटायरमेंट से तीन दिन पहले पीएम मोदी को एक चिट्ठी लिखी थी, जिसे लेकर वह सुर्खियों में हैं.

बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रंगनाथ पांडे ने पीएम नरेंद्र मोदी को को चिट्ठी लिखकर आरोप लगाया है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों का सलेक्शन चाय पार्टी और दावतों में किया जाता है. इस चिट्ठी में जज साहब ने लिखा है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति में जातिवाद और वंशवाद को वरीयता दी जाती है. चिट्ठी में लिखा है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में किसी जज के परिवार से होना ही अगला न्यायधीश बनना सुनिश्चित करता है.

चिट्ठी में आगे लिखा है, ‘हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों की चयन प्रक्रिया बंद कमरों में चाय की दावत में वरिष्ठ जजों की पैरवी व पसंदीदा होने की कसौटी पर की जाती रही है. इस संपूर्ण प्रक्रिया में गोपनीयता का विशेष ध्यान रखा जाता है तथा भावी न्यायधीशों को नाम नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सार्वजनिक किए जाने की परंपरा रही है.’

यह भी पढ़ेंः जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सामने आया केंद्र और न्यायपालिका में टकराव

‘अर्थात कौन किस आधार पर चयनित हुआ इसका निश्चित मापदंड ज्ञात नहीं है, साथ ही प्रक्रिया को गुप्त रखने की परंपरा पारदर्शिता के सिद्धांत को झूठा सिद्ध करने जैसी है.’

चिट्ठी में आगे लिखा है, ‘महोदय, जब आपकी सरकार द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक चयन आयोग को स्थापित करने का प्रयास किया गया था तब पूरे देश को न्यायपालिका में पारदर्शिता के प्रति आशा जगी थी. परंतु दुर्भाग्यवश माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप मानते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया था. न्यायिक चयन आयोग के स्थापित होने के साथ ही न्यायधीशों को अपने पारिवारिक सदस्यों की नियुक्ति करने में बाधा आने की संभावना बलवती होती जा रही थी. माननीय सर्वोच्च न्यायालय की इस विषय में अति सक्रियता हम सभी के लिए आंख खोलने वाला प्रकरण सिद्ध होता है.’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Type in
Details available only for Indian languages
Settings
Help
Indian language typing help
View Detailed Help