जिला पुस्तकालय बदहाल, किताबों में लगे दीमक, जिम्मेदार मौन

उमेश गुप्ता महाराजगंज: पुस्तकों से सिर्फ अक्षर ज्ञान ही नहीं होता है बल्कि वह बेहतर मार्ग चुनने का रास्ता भी बताती हैं। इसी उद्देश्य के साथ मार्च 2012 में महराजगंज जिला मुख्यालय पर राजकीय पुस्तकालय की स्थापना हुई थी लेकिन देखरेख और जागरूकता के अभाव में पुस्तकालय की स्थिति बदतर होती जा रही है।
आपको बता दें कि मार्च 2012 में जिला पुस्तकालय की स्थापना इस उद्देश्य से किया गया था की महराजगंज के लोग पुस्तकों के ज्ञान से अपने सोचने व समझने की क्षमता को विकसित करेंगे।
लेकिन आठ साल में ही जिला पुस्तकालय के भवन जर्जर हो गए हैं । और जिम्मेदारों के उदासीनता के कारण पुस्तकालय की व्यवस्था और बदतर होता जा रहा है। इस पुस्तकालय के मुख्य गेट से इंट्री करते ही आपको इसके बदहाल होने के सुबूत मिलने लगते हैं। यहाँ कैंपस में बड़ी- बड़ी घास और चारों ओर फैले गंदगी का अम्बार नजर आता है। पुस्तकालय के भवन के भीतर तो उससे भी भारी समस्या नजर आता है। आप खुद तस्वीरों में देखिए की यहां किस तरह से अखबारों को अस्त-व्यस्त रखा गया है। टूटी कुर्सियां, खराब पड़े पंखे, फर्श पर पसरा गंदगी, शौचालय में गंदगी व शौचालय का टूटा दरवाजा यहां के भारी दुर्व्यवस्थाओं की गवाही दे रहे हैं । आश्चर्यजनक बात यह है कि आठ साल में पुस्तकालय में महज 80 लोग ही आजीवन सदस्य बनाए गए हैं। यहां बड़ा सवाल यह खड़ा होता है की जनपद के लोगों में किताबों को लेकर रुचि अत्यंत कम है या इस पुस्तकालय के ढेर सारी समस्याओं के कारण लोग यहां आना नही चाहते हैं। जब इस पुस्तकालय की बदहाली के बारे में जिला विद्यालय निरीक्षक अशोक कुमार सिंह से पूछा गया तो उन्होंने बताया की पुस्तकालय लो लैंड में बने होने के कारण बरसात के समय में कैंपस में भारी जल-जमाव हो जाता है और पुस्तकालय का भवन जर्जर होने के कारण बारिश के मौसम में छत से पंखे में पानी आ जाता है जिससे कई पंखे खराब हो चुके हैं । लॉक डाउन के पहले जिलाधिकारी के निरीक्षण के बाद प्रस्ताव बनाकर शाशन को भेजा गया है बजट आने के बाद सभी समस्याओं को दूर किया जाएगा।

हैरानी की बात यह है की अभी 2 अक्टूबर को गांधी जयंती था बावजूद इसके स्वच्छता अभियान का असर यहां क्यों नहीं दिख रहा है। आखिर जिम्मेदार इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं ये बड़ा सवाल है। यहां पुस्तकालय में किताबों के सही से रख-रखाव न होने की वजह से किताबों को दीमक चाट रहे हैं। यदि जिम्मेदारों ने संख्या को बढ़ाने की दिशा में ध्यान नहीं दिया तथा बहुत जल्द बदहाली को दूर करने के लिए कदम नहीं उठाया तो इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

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