सुकमा की घटना को टाला जा सकता था, एमपीवी का इस्तेमाल जारी रहेगा : सीआरपीएफ

नई दिल्लीः सीआरपीएफ प्रमुख आरआर भटनागर ने शुक्रवार (16 मार्च) को कहा कि छत्तीसगढ़ में हालिया नक्सल हमले को ‘टाला’ जा सकता था. उन्होंने नक्सल विरोधी अभियान से बख्तरबंद वाहनों को हटाने की संभावना से इंकार किया. गौरतलब है कि हाल में छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में माइन प्रोटेक्टेड व्हीकल (एमपीवी) पर सवार सीआरपीएफ के नौ जवानों की मौत हो गई थी. सीआरपीएफ महानिदेशक भटनागर ने कहा कि वह मामले के विवरण में नहीं जाना चाहेंगे. उन्होंने इन क्षेत्रों में अर्द्धसैनिक बलों से कहा कि वे एहतियात बरतें और अपना अभियान जारी रखें. भटनागर ने पीटीआई- भाषा से कहा, ‘यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी. इसे टाला जा सकता था. हम अब उन परिस्थितियों की जांच कर रहे हैं कि कैसे अभियान को चलाया गया. सुधार के लिये जो भी कदम उठाने होंगे, उठाए जाएंगे. जांच चल रही है.’ भटनागर ने कहा कि एमपीवी का काफी इस्तेमाल है और यह नक्सल विरोधी अभियान में उपयोगी है.

उन्होंने कहा कि किस्टाराम और पलोड़ी के बीच पांच किलोमीटर लंबी निर्माणाधीन सड़क पर आईईडी विस्फोट करके नक्सलियों द्वारा पहले एमपीवी को उड़ाने के बाद दूसरे एमपीवी में सवार जवानों ने नक्सली दस्ते को मुंहतोड़ जवाब दिया. नक्सलियों का यह दस्ता फंसे हुए या घायल जवानों और आघात पहुंचाने के लिये जंगल में मौजूद था. उन्होंने कहा, ‘दूसरे एमपीवी के बख्तर पर तकरीबन10 गोलियां दागी गईं. इसके भीतर मौजूद जवानों ने विस्फोट के बाद माओवादियों की ओर से की जा रही भारी गोलीबारी का मुंहतोड़ जवाब दिया, क्योंकि वे सुरक्षित थे.’

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यह पूछे जाने पर कि क्या एमपीवी इस तरह के अभियानों में संवेदनशील हैं और इससे बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी मारे जा सकते हैं तो भटनागर ने कहा कि बल की इन बख्तरबंद वाहनों को हटाने की कोई योजना नहीं है. उन्होंने कहा, ‘नक्सल विरोधी अभियानों में एमपीवी का इस्तेमाल करने की रणनीति है- कि कब और कैसे उनका इस्तेमाल करना है. वे तैनाती और हालिया हमले जैसे हमलों का मुकाबला करने में उपयोगी हैं. आप उन्हें अनुपयोगी नहीं कह सकते.’

डीजी ने कहा कि उस दिन दो एमपीवी के इस्तेमाल के पीछे की जरूरत और तर्क की कोर्ट ऑफ इनक्वायरी: सीओआई: के तहत जांच की जा रही है. उन्होंने कहा कि वह मुद्दे या एक- दूसरे पर दोषारोपण में नहीं पड़ना चाहेंगे कि कैसे जमीन पर मौजूद सीआरपीएफ के लोगों ने खुफिया सूचनाओं को लिया और स्थानीय पुलिस अधीक्षक अभिषेक मीणा की उस दिन यात्रा हुई. सीआरपीएफ की 212 वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) प्रशांत धर भी पुलिस अधीक्षक के साथ थे जब विस्फोट से कुछ मिनट पहले ही वे उस स्थान से गुजरे थे जहां धमाका हुआ था. उन्होंने कहा, ‘हम राज्य पुलिस के साथ अच्छे तालमेल से काम कर रहे हैं और इस घटना के बावजूद हमारे जवान और अन्य पहले अभियान के लिये तैयार हैं, जैसा वे हमेशा थे.’

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डीजी ने कहा कि आईईडी का पता लगाना छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों के लिये ‘बड़ी चुनौती’ है और सीआरपीएफ जमीन भेदने वाले रडार जैसे कुछ समाधानों की पड़ताल कर रही है. छिपी हुई आईईडी की समस्या की वजह से इन अभियानों में इन वर्षों में सैकड़ों सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं और घायल हुए हैं.

इस बीच, सुरक्षा प्रतिष्ठान में आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि सीआरपीएफ जांच में उन परिस्थितियों की जांच की जाएगी कि उस दिन बारूदी सुरंग की मौजूदगी के खिलाफ कैसे कच्ची सड़क को साफ किया गया था, विशेषतौर पर जब सीआरपीएफ- कोबरा के विशेष जंगल लड़ाकू दल की उसी इलाके में उस सुबह माओवादियों के साथ मुठभेड़ हुई थी. उन्होंने बताया कि यह प्रकाश में आया है कि राज्य पुलिस और जिला आरक्षी बल (डीआरजी) के दल ने वस्तुत: सड़क के एक भाग को ही साफ किया था. इसे शिविर से पलोड़ी में सीआरपीएफ के खोले गए नये शिविर में दोपहर के करीब एमपीवी को ले जाने से पहले साफ किया गया था.

उन्होंने कहा कि सड़क के दोनों भागों को अगर साफ किया गया होता तो आईईडी का पता लग जाता और बेशकीमती जीवन को बचाया जा सकता था. हालांकि, यह जांच का हिस्सा है कि क्यों सड़क के एक ही हिस्से को साफ किया गया और क्यों यह काम सीआरपीएफ के दस्ते ने नहीं किया और इसे अन्य बलों पर छोड़ दिया.

सूत्रों ने बताया कि उस हमले में बल ने मारे गए जवानों के चार एके सीरीज के राइफल भी खो दिये और ऐसा समझा जाता है कि नक्सली इसे लेकर भाग गए. वहां हुआ विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि एमपीवी का इंजन हवा में 80 सेंटीमीटर से अधिक उछल गया था. उन्होंने बताया कि विस्फोट से काफी बड़ा गड्ढा बन गया था और सीआरपीएफकर्मी विस्फोट के प्रभाव और आघात से मर गए. उन्होंने कहा कि अगर दूसरे एमपीवी में सीआरपीएफकर्मी और मोटरसाइकिल पर चल रहे सुरक्षाकर्मी और कुछ डीआरजी और राज्य पुलिस के जवान विस्फोट स्थल के आस- पास नहीं होते तो और क्षति होती . इसके तहत जवानों के शवों को क्षत- विक्षत किया जा सकता था. एमपीवी में कुल 11 सीआरपीएफ जवान बैठे थे जब नक्सलियों ने आईईडी धमाके में उसे उड़ा दिया था. हमले नौ सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे.

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