वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

publiclive.co.in[Edited by Ranjeet]
सुप्रीम कोर्ट ने गुरूवार को कहा कि भारत में दस करोड़ से अधिक बुजुर्गो के अधिकारों का सम्मान करने के साथ ही इन्हें लागू किया जाना चाहिए. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को सभी राज्यों से प्रत्येक जिले में उपलब्ध वृद्धाश्रमों की संख्या के बारे में जानकारी प्राप्त करने का निर्देश दिया है.

न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने बुजुर्गो के लिये पेंशन व्यवस्था पर नए सिरे से गौर करने और उसे अधिक वास्तविक बनाने का सुझाव दिया.

न्यायालय ने सामाजिक न्याय के पहलू पर जोर देते हुए कहा कि बुजुर्गों सहित सभी नागरिकों के गरिमा के साथ जीने, रहने और स्वास्थ्य के अधिकार सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी ही नहीं हैं बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि इन अधिकारों की रक्षा हो और इन्हें लागू किया जाए.

पीठ ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों से प्रत्येक जिले में वरिष्ठ नागरिकों के लिये उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं और देखभाल की व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त करे.

पीठ ने कहा कि राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों से प्राप्त जानकारी के आधार पर माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल एवं कल्याण कानून, 2007 के प्रावधानों का समुचित प्रचार करने के लिये कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए ताकि बुजुर्गो को उनके सांविधानिक और विधायी अधिकारों के प्रति जागरूक बनाया जा सके. न्यायालय ने केन्द्र को इस संबंध में 31 जनवरी तक स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केन्द्र सरकार को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुये राज्यों को वरिष्ठ नागरिक देखभाल और कल्याण कानून के प्रावधानों पर अमल के लिये उचित निर्देश देने चाहिए और इसकी प्रगति पर निगाह रखनी चाहिए.

सरकार की मौजूदा योजनाओं का जिक्र करते हुये पीठ ने कहा कि अब समय आ गया है कि केन्द्र सरकार इन योजनाओं पर नये सिरे से गौर करे और इनमे एकरूपता लाने का प्रयास करे.

पीठ ने कहा कि विशेषकर केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को बुजुर्गो के लिये पेंशन योजना पर फिर से विचार करके इसे और अधिक उपयोगी बनाना चाहिए. पीठ ने कहा कि निश्चित ही यह केन्द्र और राज्य सरकारों के वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और आर्थिक क्षमता पर निर्भर करेगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बुजुर्गो के अधिकार लागू करने की प्रगति की सतत् निगरानी जरूरी है.

पीठ ने संविधान दिवस पर 26 नवंबर को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के भाषण का जिक्र किया और कहा कि उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिये सामाजिक न्याय पर जोर दिया. हमारे संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक न्याय को गौरवपूर्ण स्थान दिया गया है और इसकी वजह भी है क्योंकि शायद यह न्याय का सबसे महत्वपूर्ण और अहम स्वरूप है.

पीठ ने पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार और संजीब पाणिग्रही की याचिकओं पर अपने फैसले में यह बात कही है. इन याचिकाओं में बुजुर्गो के हितों से संबंधित मुद्दों को उठाया गया था.

पीठ ने कहा कि केन्द्र ने 2007 में 60 से 79 आयु वर्ग के बुजुर्गो के लिये दो सौ रूपए प्रतिमाह की पेंशन निर्धारित की थी और 80 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गो के लिये पेंशन की राशि 500 रूपए थी. पीठ ने शीर्ष अदालत के अनेक फैसलों का जिक्र करते हुये कहा कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार का हिस्सा है.

पीठ ने बुजुर्गो के लिए पेंशन और दूसरे मुद्दों से संबंधित 2005 के राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम का संज्ञान लिया और कहा कि केन्द्र, राज्य सरकारों और केन्द्र शासित प्रदेशों को मिलकर काम करना होगा, यदि वे कार्यशील और तर्कसगत योजना बनाना चाहते हैं.

न्यायालय ने कहा कि करीब दो दशक पहले शीर्ष अदालत ने किसी भी मानव के लिये आश्रय के अधिकार अथवा तर्कसंगत आवास के अधिकार को बुनियादी आवश्यकता का हिस्सा माना था परंतु दुर्भाग्य से बुजुर्गो की जरूरतों की ओर ध्यान ही नहीं दिया गया जबकि उन्हें अधिक देखभाल की आवश्यकता है.

पीठ ने इस तथ्य का भी जिक्र किया कि 1951 में देश में 1.98 करोड़ बुजुर्ग थे जिनकी संख्या 2001 में 7.6 करोड़ और 2011 में 10.38 करोड़ हो गयी थी. इस आधार पर अनुमान है कि 2026 तक इनकी संख्य 17.3 करोड़ तक पहुंच जाएगी.

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