UP में पंचायत चुनाव से बढ़ेगा कोरोना:’गांव की सरकार’ बनाने लौटने लगे महानगरों में कमाने वाले; पिछले साल आए तो ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची थी मगर अब ऐसा कुछ नहीं

लखनऊ

कानपुर में नामांकन के लिए लगी भीड़। इस दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। - Dainik Bhaskar

कानपुर में नामांकन के लिए लगी भीड़। इस दौरान कोरोना प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया।

बंगाल समेत 5 राज्यों में हो रहे चुनाव के चलते देश में गहमागहमी का माहौल है तो UP में गांव की सरकार बनाने के लिए भी खूब जोर आजमाइश हो रही है। पंचायत चुनाव के लिए प्रथम चरण का नामांकन खत्म हो चुका है। समर्थक अपने प्रत्याशी के जिंदाबाद के नारों में मशगूल हैं, लेकिन इस बीच सवाल यह है कि आखिर प्रदेश में बढ़ते कोरोना को कैसे रोका जाएगा? दरअसल, जानकारों की चिंता इस बात की है कि गांव की सरकार बनाने के लिए जो प्रवासी मजदूर वापस आ रहे हैं उनको कैसे सरकार ट्रेस करेगी? सवाल यह भी है कि कहीं इनकी वजह से तो कोरोना के आंकड़ों में बढ़ोत्तरी तो नहीं हो रही है? इन्ही सब सवालों के जवाब तलाशती है यह रिपोर्ट….

सबसे पहले जानिए कैसा है गांव का हाल?
कानपुर नगर के कल्याणपुर विकास खंड का यह नजारा आपको चौंका सकता है। लाइन में पंचायत चुनावों के लिए नामांकन कराने वालों की लंबी लाइन है। किसी के मुंह पर मास्क है तो किसी के गले में मास्क लटका हुआ है। चुनाव आयोग के साफ निर्देशों के बावजूद आपको यहां आपको न सोशल डिस्टेंसिंग दिखेगी न ही थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था मिलेगी। बहरहाल, आजकल यह नजारा पंचायत चुनावों की वजह से हर जिले में देखने को मिलेगा।

कानपुर के कल्याणपुर ब्लॉक पर नामांकन के लिए लगी भीड़।

कानपुर के कल्याणपुर ब्लॉक पर नामांकन के लिए लगी भीड़।

  • यहीं लाइन में राहुल वर्मा मिले। वे अपने प्रत्याशी का समर्थन करने आए हैं। राहुल भी भीड़ में खड़े हैं। चेहरे से मास्क गायब है। राहुल बताते हैं कि वह दिल्ली में किसी फैक्ट्री में काम करते हैं। लॉकडाउन में कभी गाड़ी, कभी ट्रक तो कभी पैदल चलकर बड़ी मुश्किलों से घर पहुंचे थे। जब लॉकडाउन हटा तो फिर काम पर वापस चले गए। लेकिन अब गांव अपने प्रत्याशी के सम्मान के लिए वापस आए हैं।
  • राहुल कहते हैं कि हमारा प्रत्याशी पिछले 5 साल से चुनाव की तैयारी कर रहा है। ऐसे में हम अगर वोट करने नहीं आते तो यह गलत होता। हम फैक्ट्री से छुट्टी लेकर आए हैं। जबकि छुट्टी का पैसा भी कटेगा। लेकिन हमारी नौकरी से ज्यादा हमारे प्रत्याशी की जीत जरूरी है। जब उनसे पूछा गया कि जब पिछली बार आप आए थे तो कई जगह आपकी चेकिंग की गई होगी क्या इस बार भी ऐसा हुआ? तो राहुल ने कहा नही मुझे कोरोना नहीं है तो चेकिंग की क्या जरूरत है? वह पूछते है कि क्या हमें क्वारैंटाइन किया जाएगा।
राहुल।

राहुल।

  • अब कानपुर नगर से निकल कर सिद्धार्थनगर चलते हैं। सिद्धार्थनगर के ग्राम पंचायत हल्लौर निवासी गौतम अभी 2 दिन पहले मुंबई से लौटे हैं। उन्हें पंचायत चुनावों में अपना वोट डालना है। गौतम बताते हैं कि वह पिछले ढाई-तीन साल से मुंबई में पेंटिंग का काम करते हैं। 8 से 10 हजार रुपए महीना कमा लेते हैं। वह खुद बताते है कि मुंबई में कोरोना की स्थिति बहुत बुरी है। घर से बाहर निकलने पर मास्क जरूरी है।
गौतम।

गौतम।

  • हल्लौर के बगल ही भटनगवा ग्राम पंचायत है। यहां रामकन्हैया पुणे से आए हैं। बताते है कि वह वहां ड्राइवर हैं। महीने का 15 हजार कमाते हैं। अब पंचायत चुनाव में वोट डालना था तो गांव आ गए हैं। वह खुद बताते है कि पुणे में कोरोना को लेकर बहुत सख्ती है। यहां तो कोरोना खत्म हो गया है।
राम कन्हैया।

राम कन्हैया।

यह कुछ मामले बानगी भर हैं कि कैसे प्रवासी मजदूर गांव की सरकार बनाने के लिए दूसरे राज्यों से UP आ रहे हैं।

न थर्मल स्कैनिंग, न क्वारैंटाइन सेंटर, कैसे रुकेगा संक्रमण?

लॉकडाउन के दौरान श्रमिक ट्रेन चलाई गई थी। जिससे 16 लाख प्रवासी मजदूरों को लाया गया था। जबकि बसों द्वारा या अन्य साधनों से भी 6 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर पहुंचे थे। लेकिन तब बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन पर थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था थी। जिनका भी तापमान मानक से ऊपर होता उन्हें क्वारैंटाइन किया जाता था। गांव गांव में सरकार ने क्वारैंटाइन सेंटर बनाए थे। जिनमें प्रवासी मजदूरों ने 14 दिन रहने के बाद गांव में प्रवेश किया था। लेकिन इस बार ऐसी कोई सुविधा अभी तक नहीं है। न गांव में क्वारैंटाइन सेंटर बनाए गए हैं ना ही पब्लिक प्लेस पर सख्ती की जा रही है। रेलवे स्टेशन और बस स्टेशन पर अच्छी खासी भीड़ दिख रही है। ऐसे में संक्रमण कैसे रुकेगा यह बड़ा सवाल है।

सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज ब्लॉक पर नामांकन के लिए लगी भीड़।

सिद्धार्थनगर के डुमरियागंज ब्लॉक पर नामांकन के लिए लगी भीड़।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

सीनियर जर्नलिस्ट प्रदीप कपूर कहते हैं कि गांव का वोटर भले ही लोकसभा या विधानसभा के चुनाव में वोट न डाले, लेकिन पंचायत चुनाव में वोट जरूर डालता है। मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, गुजरात जैसे राज्यों में भी नौकरी करने वाले ग्रामीण ही नहीं बल्कि गल्फ देशों में काम करने वाले भी इन चुनावों का हिस्सा बनने विदेशों से आते हैं। दरअसल, यही एक चुनाव होता है जहां उन्हें अहमियत मिलती है। गांव वाले भी अपनी अहमियत को दर्शाना चाहते हैं। यही वजह है कि गांव की सरकार बनाने के लिए वोटर चाहे जहां हो वह चला आता है।

प्रदीप कपूर कहते है कि हमारी 80 फीसदी आबादी गांव में है। यदि कोरोना का संक्रमण वहां फैल गया तो बड़ी मुश्किल होगी। उन्होंने बताया कि पिछले साल कोरोना के आंकड़ों में रख चौथाई हिस्सा ग्रामीण इलाकों का होता था लेकिन जानकर कह रहे हैं कि अबकी बार यह 50 फीसदी तक पहुंच गया है।

क्या कहते हैं आंकड़े?

जानकर मानते हैं कि पंचायत चुनावों का एलान 23 मार्च को हुआ है। जिसके बाद गहमागहमी बढ़ी है। ऐसे में कोरोना के बढ़ते आंकड़े इस ओर ही इशारा कर रहे हैं। हालांकि सरकार ने इनको ध्यान में रखते हुए गांव की निगरानी समितियों को एक्टिव कर दिया गया है। लेकिन अभी यह सिर्फ खानापूर्ति ही लगती है। बहरहाल, सरकार की ओर से मिली जानकारी के अनुसार यूपी में अब तक 6 लाख 577 कोरोना मरीज ठीक हो चुके हैं। प्रदेश का रिकवरी रेट 96 फीसदी है। लेकिन नीचे पिछले 5 दिनों के दिये गए आंकड़े परेशान करने वाले हैं।

तारीखनए केसमौत
30 मार्च9,1810
31 मार्च1,23011
01 अप्रैल2,60009
02 अप्रैल2,96716
03 अप्रैल4,16431

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