भारत को जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र पड़ा भारी, हार गई सुधारों की ‘राजनीति’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने तीनों नए कृषि कानून वापस (New Farm Law) लेने का ऐलान किया है. इस फैसले पर कुछ अच्छे और कुछ खराब असर  पड़ने जा रहे हैं. 

नई दिल्ली: बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने तीनों नए कृषि कानून वापस (New Farm Law) लेने का फैसला लेकर मैदान छोड़ दिया है. अगर वो इस फैसले पर अड़े रहते और उनका फैसला जीत जाता तो ये मजबूती की एक मिसाल बन जाता. लेकिन सच ये है कि बहुत सारे युद्ध ऐसे होते हैं, जिन्हें लड़ने में अपनी शक्ति व्यर्थ नहीं करनी चाहिए. 

उदाहरण के लिए जब भगवान कृष्ण ने कंस का वध किया तो इसका बदला लेने के लिए जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया. श्री कृष्ण हर बार उसे पराजित कर देते थे, लेकिन उसका वध नहीं करते थे. जब इस बारे में श्री कृष्ण से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जरासंध अधर्मी है और वो हर बार अपने साथ अधर्मियों की ही सेना लेकर आता है. हम एक बार में बहुत सारे अधर्मियों को समाप्त कर देते हैं. 

जरासंध से दूर जाकर बसाया द्वारिका नगर

यानी कई बार आप दुश्मन को सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं क्योंकि वो आपसे दुश्मनी निभाकर भी आपका ही काम आसान करता है. दूसरी बात ये है कि भगवान कृष्ण ने जरासंध से बार बार लड़ने की बजाय मथुरा को छोड़ने का फैसला किया और गुजरात में द्वारिका नाम का एक नया और आधुनिक नगर बसाया. यानी श्री कृष्ण ने एक ऐसे युद्ध पर अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं की जिसका कोई नतीजा नहीं निकल रहा था, बल्कि उन्होंने रण ही छोड़ दिया. इसलिए वो रणछोड़ दास कहलाए. कृष्ण ने इसी ऊर्जा का इस्तेमाल दूसरे शुभ कामों के लिए किया और अपने समय से आगे का एक शहर बसा दिया.

इसी तरह जीवन हो या राजनीति वहां भी व्यर्थ के युद्ध लड़ने की ज़रूरत नहीं होती, बल्कि ऊर्जा बचाना महत्वपूर्ण हो जाता है ताकि आप बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकें. भगवत गीता के दूसरे अध्याय के पहले और दूसरे श्लोक का सार भी यही है कि जब शत्रु अपने ही लोग हो तो युद्ध धर्म संकट का रूप ले लेता है. हालांकि एक कुशल शासक वही है, जो हर परिस्थिति का आकलन करता है, उसका विश्लेषण करता है और फिर लक्ष्य को ध्यान में रखकर फैसले लेता है.

यूपी- पंजाब में हो सकता है बीजेपी को फायदा

राजनीति भी लक्ष्य साधने का ही दूसरा नाम है. इसलिए आप कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी  (Narendra Modi) ने फैसला कुछ बड़े लक्ष्यों को ध्यान में रखकर लिया होगा. इससे 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधान सभा चुनावों में बीजेपी को फायदा हो सकता है.

आंदोलन में जिन किसान संगठनों और नेताओं की सबसे ज़्यादा भागीदारी है, उनमें अधिकतर पश्चिमी यूपी के हैं और जाट समुदाय से आते हैं. अब कहा ये जा रहा था कि अगर कृषि क़ानून रहते हुए यूपी के विधान सभा हुए तो पश्चिमी यूपी में बीजेपी को बड़ा नुक़सान होगा. क्योंकि इस क्षेत्र में कुल 26 ज़िले और 136 विधान सभा की सीटें हैं. इनमें 29 सीटें ऐसी हैं, जहां जाट समुदाय के वोटरों की संख्या 50 हज़ार से डेढ़ लाख है. 

2017 के चुनाव में बीजेपी को यहां 109 सीटें मिली थीं. यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगभग 80 प्रतिशत सीटें बीजेपी ने ही जीत ली थीं. अब कृषि क़ानून के ख़त्म होने के बाद बीजेपी फिर से खुद को इन इलाक़ों में मजबूत कर सकती है. इसके अलावा पंजाब के किसान भी इस आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे, इसलिए पंजाब के चुनाव पर भी इसका असर पड़ेगा

इन बातों पर भी पड़ेगा असर

– इसका दूसरा फायदा ये होगा कि कृषि कानून के नाम पर जिन किसान नेताओं ने अपनी दुकानें खोली हुई थीं, अब वो बंद हो जाएंगी.
– किसान आन्दोलन में जो देशविरोधी ताक़तें थीं, जो टुकड़े टुकड़े गैंग इस आन्दोलन का फायदा उठा रहा था. अब उस पर भी ताला लग जाएगा.
– विपक्षी दल भी कृषि क़ानूनों को चुनाव में मुद्दा नहीं बना पाएंगे क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने उनसे ये मुद्दा छीन लिया.
– आंदोलन ख़त्म होने से दिल्ली की सीमाओं पर सड़कें भी खुल जाएंगी, जिससे आम लोग बिना किसी परेशानी के कहीं भी आ जा सकेंगे.
– पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के जिन व्यापारियों को इस आन्दोलन से प्रति दिन साढ़े 3 हज़ार करोड़ रुपये का नुक़सान हो रहा था, अब वो नहीं होगा.
– और सबसे अहम इससे दुनिया में भारत के लोकतंत्र को लेकर भी एक संदेश जाएगा. जो देश भारत के लोकतंत्र को ख़तरे में बताते हैं, उन्हें पता चलेगा कि भारत एक ऐसी Democracy है, जहां कुछ लोग सड़कें बंद करके देश की संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को भी वापस करा सकते हैं और सरकार उनकी बात को मान भी लेती है. पश्चिमी देश जो खुद को लोकतंत्र का चैंपियन बताते हैं, वहां भी कानूनों को वापस लेने की ऐसी परंपरा नहीं रही है.

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इस फैसले के कई नुक़सान भी होंगे

– हमारे देश का एक ख़ास वर्ग, जो कश्मीर में अनुच्छेद 370 को फिर से बहाल करने की मांग करता है, अब उसे ऐसा लगेगा कि अगर वो भी सड़कों को बन्द करके बैठ जाए और केन्द्र सरकार पर दबाव बनाए तो कश्मीर में पुरानी व्यवस्था लौट सकती है.
– जो लोग पिछले वर्ष तक दिल्ली के शाहीन बाग़ में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ आन्दोलन पर बैठे थे, हो सकता है वो लोग फिर से इकट्ठा हो जाएं. क्योंकि इससे उनकी भी उम्मीद जागी होगी कि CAA को भी रद्द कराया जा सकता है.
– एक देश, एक टैक्स के सिद्धांत का विरोध करने वाले लोग अब ये सोच रहे होंगे कि वो GST कानून को समाप्त करा सकते हैं.
– यानी देश की संसद द्वारा बनाए गए हर उस क़ानून का विरोध होगा, जिसे हमारे देश का एक ख़ास वर्ग पसन्द नहीं करता.
– दुनिया के किसी भी देश में जब आम लोगों के बीच ये धारणा बन जाए कि कुछ लोगों का समूह सरकार पर दबाव बना कर उसके बनाए कानून को खत्म करा सकता है, तो उस देश में सरकार द्वारा बनाए गए क़ानून का महत्व और उनकी शक्ति कम हो जाती है. हमें लगता है कि आज का फैसला एक ऐसा ही Template बन गया है, जिसके आधार पर भविष्य में लोकतंत्र का ज़बरदस्त दुरुपयोग होगा.

आज भारत का लोकतंत्र एक ऐसे रास्ते पर चल पड़ा है, जो काफ़ी जटिल है. ये हमारे देश के लोकतंत्र के लिए एक Truning Point भी है. इस Turning Point में लोकतंत्र संसद से बाहर निकल कर सड़क पर खड़ा है.

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