जेवर एयरपोर्ट से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यूं उड़ान भरेगी भाजपा?

25 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का शिलान्यास करने जा रहे हैं

नई दिल्ली: किसान आंदोलन की तपिश के बीच बीजेपी जेवर एयरपोर्ट के जरिए पश्चिमी यूपी में उड़ान भरने की तैयारी कर रही है. इस क्षेत्र में एयरपोर्ट की मांग काफी अरसे से हो रही थी.करीब 2 दशकों से घोषणाओं और फाइलों में घूमता जेवर एयरपोर्ट अब धरातल पर उतरने जा रहा है. 25 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का शिलान्यास करने जा रहे हैं.

पूरब में पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सौगात देने के बाद बीजेपी का फोकस पश्चिम की तरफ है. जहां बीजेपी विपक्ष के सवालों को अपने विकास मॉडल के जरिए जवाब देने की कोशिश कर रही है. देश के सबसे बड़े इंटरनेशल एयरपोर्ट के पहले चरण का काम साल 2024 में पूरा हो जाएगा. एक रनवे के साथ इसकी शुरुआत होगी. कुल 8 रनवे मनेंगे. 1.2 करोड़ यात्रियों की क्षमता होगी. 

दुनिया का चौथा सबसे बड़ा एयरपोर्ट
जेवर एयरपोर्ट दुनिया का चौथा अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बनने जा रहा है. दुनिया का सबसे बड़ा एयरपोर्ट सउदी अरब का किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट है जिसका क्षेत्रफल 77,600 हेक्टेयर है?

इसके बाद दूसरे तीसरे और चौथे नंबर पर अमेरिका के डेनवर, डलास और ऑरलैंडो इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं लेकिन 5845 हेक्टेयर क्षेत्रफल के साथ जेवर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट ऑरलैंडो इंटरनेशनल एयरपोर्ट को पछाड़ कर चौथे नंबर का एयरपोर्ट बन जाएगा. 

यूपी में 2 से बढ़कर पांच हो जाएंगे एयरपोर्ट
यूपी में 2012 तक सिर्फ दो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे लखनऊ और वाराणसी थे. अयोध्या में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का काम जारी है. उम्मीद है अगले साल तक उड़ानें शुरू हो जाएंगी. जेवर इसी कड़ी में पांचवा इंटरनेशन एयरपोर्ट होगा. वर्तमान में उत्तर प्रदेश में आठ ऑपरेशनल एयरपोर्ट्स हैं. जबकि 13 हवाई अड्डे और 7 हवाई पट्टी विकसित की जा रही हैं  

एयरपोर्ट से 5 लाख रोजगार की संभावना  
जेवर एयरपोर्ट के कारण जेवर और पश्चिमी यूपी के करीब 5 लाख युवाओं को रोजगार मिलने की संभावना है. एक अनुमान के मुताबिक 80 हजार करोड़ रुपये का निवेश होगा. होटल, मोटल, लेजर प्लाजा, शॉपिंग सेंटर और कन्वेंशन सेंटर बनेंगे. 

इन जिलों के लोगों को सबसे ज्यादा फायदा
इससे दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर दबाव भी कम होगा. जेवर एयरपोर्ट के बन जाने से न केवल दिल्ली और नोएडा को फायदा होगा बल्कि इसके बनने से नोएडा के करीब 150 किलोमीटर के दायरे में आने वाले गाजियाबाद, बुलंदशहर, आगरा, मथुरा, मेरठ, बरेली, मुजफ्फरनगर, शामली, सहारनपुर, बागपत, हाथरस और अलीगढ़ जैसे कई शहरों को सीधा फायदा होगा?

इन जिलों के अलावा यूपी-हरियाणा के कई दूसरे जिलों के लिए भी जेवर एयरपोर्ट दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के विकल्प के तौर पर उभरेगा.

राजनाथ सिंह की सरकार में बना था प्लान
जेवर एयरपोर्ट की फाइल पहली बार 2001 में राजनाथ सिंह के सीएम रहते बन गई थी लेकिन आगे नहीं बढ़ पाई. फिर अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लखनऊ से दिल्ली, दिल्ली से लखनऊ घूमते रही. 

2007 में तत्कालीन मायावती सरकार ने फिर से एयरपोर्ट का प्रस्ताव तत्कालीन कांग्रेस की केंद्र सरकार को भेजा तब सरकार ने ये कहते हुए जेवर एयरपोर्ट को मंजूरी नहीं दी कि इंदिरा गांधी एयरपोर्ट से जेवर की दूरी 72 किमी है. केंद्र सरकार का दिल्ली एयरपोर्ट को संचालित करने वाली कंपनी जीएमआर के साथ समझौता है कि 150 किमी के दायरे में दूसरा एयरपोर्ट नहीं बनेगा?

2012 में सपा सरकार ने जेवर एयरपोर्ट का प्रस्ताव रद्द कर दिया लेकिन 2014 में केंद्र में बीजेपी सरकार आने के बाद प्रदेश की तत्कालीन सपा सरकार को एयरपोर्ट के लिए डीपीआर बनाने को कहा गया. एयरपोर्ट के जेवर से आगरा तो कभी हरियाणा शिफ्ट करने की बात भी चली, फिर 2017 में प्रदेश में यूपी में बीजेपी सरकार के आने के बाद जेवर एयरपोर्ट पर काम फिर से शुरू हुआ और अब जाकर शिलान्यास तक पहुंचा है.

क्रेडिट लेने की होड़ शुरू
पूर्वांचल एक्सप्रेस की तरह जेवर एयरपोर्ट के क्रेडिट की होड़ शुरू होनी तय है अखिलेश पहले ही कह चुके हैं कि पुरानी सरकार ने जेवर एयरपोर्ट पर काम शुरू किया था. जमीन के अधिग्रहण की कार्रवाई सपा सरकार ने पूरी की .

BJP के लिए 2017 के प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती
यूपी में लखनऊ की गद्दी पाने के लिए 403 सीटों के गणित को पूरा करने के लिए पूरब से पश्चिम सभी इलाकों को साधना जरूरी है. 2017 के चुनाव में पश्चिम में बुलंद जीत मिली थी. बीजेपी ने 2017 में पश्चिम यूपी की 110 में से 88 सीटें जीत ली थीं.  जबकि 2012 के चुनाव में 38 सीटें ही मिली थीं. 

वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे 2014 की तुलना में 5 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था. लेकिन 2022 की जंग में किसान आंदोलन से उपजे सियासी समीकरण ने बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है. खास तौर पर अखिलेश और जयंत की जोड़ी यहां अपना पुराना दबदबा कायम करने को लेकर पूरे ताकत के साथ तैयार नजर आ रही है.  

गुर्जरों की नाराजगी बीजेपी की चुनौती ?
जेवर के जातीय समीकरण को देखें तो यहां जाटों के अलावा गुर्जर, मुस्लिम और दलित वोटरों का अच्छा खासा असर है जो आस पास के जिलों में असर रखते हैं. नोएडा में गुर्जरों की करीब 5 लाख के आस पास है .

इन्हें पश्चिम यूपी में बीजेपी का पारंपरिक वोटर भी माना जाता है.  लेकिन गुर्जर समुदाय दादरी में राजा मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के बाद से ही बीजेपी से नाराज है. दरअसल उनकी आपत्ति प्रतिमा से गुर्जर शब्द हटाए जाने पर थी.

बीजेपी ने गुर्जरों की नाराजगी दूर करने के लिए हाल ही में इस क्षेत्र के कद्दावर नेता और एक वक्त मुलायम सिंह करीबी रहे नरेंद्र भाटी को बीजेपी में शामिल कराया है?

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