कहानी दमदार, अभिनय शानदार; फिर बॉक्स ऑफिस पर क्यों पिछड़ जाती हैं महिला केंद्रित हिंदी फिल्में?

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‘पुरुषों की दुनिया में आगे बढ़ने वाली महिला खास होती हैं’ अमेरिकन सिंगर रिहाना का कहा गया यह कथन हिंदी सिनेमा में अब तक सच नहीं हुआ। 21वीं सदी में आकर भी दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाने वाले बॉलीवुड में महिला केंद्रित कहानी अपने लिए जगह बनाने की कोशिश में लगी हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी बॉक्स ऑफिस पर ये फिल्में सफलता से कोसों दूर हैं। ऐसा नहीं है कि महिला कलाकार या निर्देशक सार्थक प्रयास नहीं कर रहे हैं। दरअसल, इस स्थिति के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। जानिए, वो कारण क्या हैं?

‘अस्सी’ और ‘मर्दानी 3’ की पहल गई बेकार 

इस साल अब तक दो महिला केंद्रित हिंदी फिल्में रिलीज हुईं, तापसी पन्नू की ‘अस्सी’ और रानी मुखर्जी की ‘मर्दानी 3’। दोनों ही फिल्मों में महिलाओं से जुड़े संवेदनशील विषय को उठाया गया है। फिल्म ‘अस्सी’ दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध पर बात करती है, वहीं ‘मर्दानी 3’ बच्चों की तस्करी जैसा मुद्दा उठाती है। दोनों कहानियां भीतर तक झकझोरती हैं। लेकिन इनके बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को देखें तो पता चलता है कि दर्शक इनसे दूरी बनाकर चले। 

कमजोर कलेक्शन ने तोड़ दी उम्मीदें 

फिल्म ‘अस्सी’ ने रिलीज के 16वें दिन तक सिर्फ 10 करोड़ रुपये कमाए। वहीं रानी मुखर्जी स्टारर ‘मर्दानी 3’ ने 37वें दिन तक 50.36 करोड़ रुपये का कुल कलेक्शन किया है। पिछले साल काजोल की फिल्म ‘मां’ थिएटर में रिलीज हुई। वहीं ओटीटी पर ‘मिसेज’ जैसी फिल्म देखने को मिली। हर साल चंद महिला केंद्रित फिल्में ही दर्शकों को देखने को मिलती हैं, ऐसे में सफलता का आंकड़ा भी सीमित है। प्रोड्यूसर अब भी वुमन सेंट्रिक फिल्मों में दावा खेलने से बचते हैं। 

क्या है प्रमुख कारण?

सवाल है कि सिर्फ इस बात का अफसोस मनाया जाए कि महिला केंद्रित फिल्में दर्शकों को पसंद नहीं है तो हकीकत इसके उल्ट है। दर्शकों के लिए फिल्म सिर्फ फिल्म होती है। कंगना रनौत की फिल्म ‘क्वीन’, ‘तनु वेड्स मनु’, तापसी पन्नू की ‘पिंक’, श्रीदेवी की ‘इंग्लिश विंग्लिश’, आलिया भट्ट की ‘राजी’ और ‘गंंगू बाई काठियावाड़ी’ और ‘लापता लेडीज’ इस बात उदाहरण हैं। ये फिल्में दर्शकों को खूब पसंद आईं। अपने मैसेज को भी दर्शकों तक बखूबी पहुंचाती हैं। लेकिन ऐसे कई कारण अब भी मौजूद हैं, जो महिला केंद्रित फिल्मों की राह को मुश्किल बनाते हैं। फीमेल ऑडियंस का थिएटर तक ना पहुंच पाना: आज भी आधी आबादी का एक बड़ा हिस्सा थिएटर तक पहुंच नहीं रखता है। इसके पीछे आर्थिक स्वतंत्रता की कमी एक बड़ी वजह है। महिलाओं का एक बड़ा तबका आज भी आर्थिक रूप से संपन्न होने के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में थिएटर पहुंचकर महिला केंद्रित फिल्में देखना, उनकी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हो पाया है। महिला निर्देशकों को कमी: सिनेमा जगत खासकर बॉलीवुड में धीरे-धीरे महिलाएं अभिनय के अलावा कई फील्ड में अपने लिए जगह बना रही हैं। कई महिला निर्देशक हमारे दौर में मौजूद हैं। लेकिन यह संख्या गिनती की है। आज भी महिला केंद्रित फिल्मों को पुरुष निर्देशक बनाते हैं। जब कोई पुरुष महिला विषय पर बात करेगा तो कहीं ना कहीं उतनी संवेदनशीलता पर्दे पर नजर नहीं आएगी जो दिखनी चाहिए। एक स्त्री की भावनाओं को एक स्त्री के नजरिए से जब निर्देशित किया जाएगा तो उसका असर गहरा होगा। गौरी शिंदे की फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ और किरण राव की ‘लापता लेडीज’ इस बात का सफल उदाहरण हैं। दोनों फिल्मों में बहुत बारीकी और गहराई से महिलाओं की सोच और भावनाओं को व्यक्त किया गया है। पितृसत्तात्मक सोच का हावी होना : बॉलीवुड हो या दर्शक इन पर कहीं ना कहीं आज भी पितृसत्तात्मक सोच हावी है। एक बड़ा पुरुष वर्ग बड़े पर्दे पर महिला केंद्रित कहानी देखकर असहज हो जाता है। दरअसल, कहानी में पुरुष समाज और पितृसत्ता की सच्चाई वह देखना नहीं चाहते हैं। फिल्म ‘मिसेज’ जब रिलीज हुई थी तो सोशल मीडिया पर पुरुष समाज का एक बड़ा वर्ग इसके खिलाफ बातें करता देखा गया। जबकि यह फिल्म एक साधारण सी कहानी के जरिए बड़े सवाल करती है। पितृसत्ता पर गहरी चोट करती है। बॉलीवुड में भी अधिकतर प्रोड्यूसर, कंपनियां भी पुरुषों द्वारा चलाई जा रही हैं, ऐसे में वह अपना पैसा सुरक्षित तरीके से निवेश करते हैं। महिला केंद्रित फिल्मों पर दावा खेलने की बजाय बड़े हीरो को लेकर मसाला फिल्में बनाते हैं।निष्कर्ष यही है कि सिनेमा में भी आधी आबादी को एक लंबा सफर आगे तय करना है। अपने लिए, अपनी कहानियों के लिए बड़े पर्दे पर जगह बनानी है।